भारत ने संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को किया सिरे से खारिज
विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र की ‘नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति’ द्वारा भारत के संबंध में जारी की गई रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मामले पर एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि समिति की रिपोर्ट में किए गए ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित और अत्यंत दुर्भावनापूर्ण’ संदर्भों को जिस अवमानना के वे हकदार हैं, उसी के साथ खारिज किया जाता है।
जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की इस समिति की 11वीं आवधिक समीक्षा बैठक में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उन्होंने बताया कि 11-12 अगस्त 2026 को जिनेवा में हुई इस बैठक में भारत के अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने संवैधानिक सुरक्षा उपायों, मजबूत कानूनी ढांचे, बहुलवाद और वंचित समुदायों की सुरक्षा के प्रयासों को विस्तार से प्रस्तुत किया था।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने इस बैठक के दौरान यह भी बताया कि 1960 के दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नस्लीय भेदभाव उन्मूलन सम्मेलन के निर्माण और मसौदा तैयार करने में भारत की अहम भूमिका रही थी। ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति की टिप्पणियों का जवाब स्थापित प्रक्रिया के तहत दिया जाएगा, न कि बिना पुष्ट प्रमाण के आरोपों के आधार पर।
विदेश मंत्रालय का आधिकारिक बयान
विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि भारत सरकार ने की रिपोर्ट में शामिल किए गए आरोपों को पूरी तरह से अस्वीकार किया है। प्रवक्ता जायसवाल ने कहा, हम राजनीतिक रूप से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण संदर्भों को खारिज करते हैं। ऐसे संदर्भों को जिस अवमानना के वे हकदार हैं, उसी के साथ खारिज किया जाता है।”
ने यह भी बताया कि जिनेवा स्थित भारतीय मिशन द्वारा की 11वीं आवधिक समीक्षा के बाद पहले ही एक विस्तृत प्रेस रिलीज जारी की जा चुकी है। इसमें बताया गया था कि भारत ने समीक्षा बैठक में भाग लेने के दौरान नस्लीय भेदभाव से लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया था।
संयुक्त राष्ट्र समिति की रिपोर्ट में क्या था
संयुक्त राष्ट्र की ‘नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति’ ने हाल ही में अपने सत्र के दौरान फिनलैंड, होंडुरास, भारत और कुवैत की समीक्षा की थी। भारत के संबंध में जारी की गई रिपोर्ट में समिति ने देश के विभिन्न वंचित समुदायों, जिनमें अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, दलित और रोहिंग्या शरणार्थी शामिल हैं, के मानवाधिकारों के उल्लंघन की खबरों को लेकर “गंभीर चिंता” व्यक्त की थी।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत को इन सभी आरोपों की तुरंत, गहन और निष्पक्ष जांच करनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। इसके अलावा, समिति ने यह भी उल्लेख किया कि इन समुदायों को “नस्लीय आधार पर हिंसा, बल का अत्यधिक प्रयोग, गैर-न्यायिक हत्याएं, उचित प्रक्रिया के बिना मनमानी और लंबी हिरासत, प्रताड़ना, दुर्व्यवहार और यौन हिंसा” का सामना करना पड़ रहा है।
भारत के संवैधानिक और कानूनी ढांचे पर उठे सवाल
संविधान में निहित सुरक्षा उपाय
- अनुच्छेद 15, 16 और 17:भारतीय संविधान के ये अनुच्छेद समानता, गैर-भेदभाव और अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
- अनुच्छेद 29 और 30:ये अनुच्छेद अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा, संस्कृति और शिक्षा संस्थानों की स्थापना का अधिकार प्रदान करते हैं।
- अनुच्छेद 341 और 342:अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल समुदायों को विशेष संरक्षण और आरक्षण का अधिकार प्रदान करते हैं।
कानूनी ढांचे में सुधार
भारत सरकार ने पिछले कुछ दशकों में नस्लीय भेदभाव और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए कई कानूनी कदम उठाए हैं। इनमें शामिल हैं:
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989:इस अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना और उनके खिलाफ किए गए अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान करना है।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955:यह अधिनियम अस्पृश्यता के उन्मूलन और समानता के अधिकार की रक्षा करता है।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (सेवा में आरक्षण) अधिनियम, 1995:सरकारी नौकरियों में आरक्षण के माध्यम से इन समुदायों को सशक्त बनाने का प्रयास किया गया है।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकार) अधिनियम, 2006:इस अधिनियम का उद्देश्य वन निवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें वन संसाधनों तक पहुंच प्रदान करना है।
बहुलवाद और सामाजिक समावेशन
भारत एक बहुलवादी समाज है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, भाषा और संस्कृतियों के लोग एक साथ रहते हैं। सरकार ने सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं, जिनमें शामिल हैं:
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग:इसका गठन पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया है।
- अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय:अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण और विकास के लिए विभिन्न योजनाओं का संचालन करता है।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग:इन आयोगों का गठन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारों की रक्षा और उनके विकास के लिए किया गया है।
वंचित समुदायों की सुरक्षा के प्रयास
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति
सरकार द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें शामिल हैं:
- आर्थिक सहायता योजनाएं:जैसे कि अनुसूचित जाति उपयोजना, अनुसूचित जनजाति उपयोजना, और विशेष केंद्र प्रायोजित योजनाएं।
- शिक्षा संबंधी योजनाएं:जैसे कि प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति, और उच्च शिक्षा में आरक्षण।
- आवास योजनाएं:जैसे कि प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण और शहरी, जिसके तहत इन समुदायों को किफायती आवास उपलब्ध कराया जाता है।
- स्वास्थ्य संबंधी योजनाएं:जैसे कि आयुष्मान भारत योजना, जिसके तहत इन समुदायों को मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।
दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग
दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए भी सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें शामिल हैं:
- आर्थिक सहायता:जैसे कि स्वरोजगार योजनाएं, कृषि ऋण, और बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच।
- शिक्षा:जैसे कि मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्ति, और व्यावसायिक प्रशिक्षण।
- स्वास्थ्य:जैसे कि सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और स्वास्थ्य बीमा योजनाएं।
- राजनीतिक सशक्तिकरण:जैसे कि पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व।
रोहिंग्या शरणार्थी
रोहिंग्या शरणार्थियों के मामले में भारत सरकार का रुख स्पष्ट रहा है। सरकार ने रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध प्रवासी करार देते हुए उन्हें देश से बाहर निकालने का प्रयास किया है। सरकार का तर्क है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की उपस्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी और उन्हें वापस उनके मूल देश म्यांमार भेजा जाएगा। सरकार ने यह भी कहा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को किसी भी प्रकार की सहायता प्रदान नहीं की जाएगी।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम अन्य देश
विदेश मंत्रालय के बयान के प्रमुख बिंदु
- राजनीतिक रूप से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण:विदेश मंत्रालय ने की रिपोर्ट को राजनीतिक रूप से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण बताया है।
- संवैधानिक सुरक्षा उपाय:भारत ने अपनी संवैधानिक सुरक्षा उपायों, कानूनी ढांचे और बहुलवाद को रिपोर्ट में प्रस्तुत किया है।
- में भारत की भूमिका:1960 के दशक में के निर्माण में भारत की अहम भूमिका रही थी।
- समिति की टिप्पणियों का जवाब:भारत ने कहा है कि समिति की टिप्पणियों का जवाब स्थापित प्रक्रिया के तहत दिया जाएगा।
- व्यापक सामान्यीकरण और बिना पुष्ट प्रमाण के आरोप:भारत ने समिति की रिपोर्ट में किए गए व्यापक सामान्यीकरण और बिना पुष्ट प्रमाण के आरोपों को खारिज कर दिया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तुलनात्मक विश्लेषण एवं मुख्य बिंदु
| मापदंड | मुख्य विवरण एवं तथ्य | दूरगामी प्रभाव |
|---|---|---|
| मुख्य विषय | संबद्ध विषय पर विस्तृत समीक्षा एवं आंकड़े | पारदर्शिता में सुधार |
| प्रशासनिक स्थिति | नियमों एवं दिशानिर्देशों के तहत त्वरित कार्रवाई | प्रक्रिया सुदृढ़ एवं प्रभावी |
| सामाजिक प्रभाव | स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता प्रसार | सुरक्षा एवं विश्वास में वृद्धि |
| भविष्य की दिशा | सत्यापित डेटा के आधार पर आगामी योजनाएं | दीर्घकालिक विकास दर में मदद |
1 क्या है और इसकी भूमिका क्या है
का पूरा नाम ‘नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति’ है। यह संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था है, जिसकी स्थापना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए की गई थी। यह समिति विभिन्न देशों की नस्लीय भेदभाव से संबंधित नीतियों और कानूनों की समीक्षा करती है और अपनी रिपोर्ट जारी करती है।
2 भारत ने की रिपोर्ट को क्यों खारिज किया
भारत ने की रिपोर्ट को इसलिए खारिज किया क्योंकि इसमें किए गए आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण थे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ऐसे संदर्भों को जिस अवमानना के वे हकदार हैं, उसी के साथ खारिज किया जाता है। भारत ने यह भी बताया कि समिति की टिप्पणियों का जवाब स्थापित प्रक्रिया के तहत दिया जाएगा, न कि बिना पुष्ट प्रमाण के आरोपों के आधार पर।
3 भारत में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ क्या कानूनी प्रावधान हैं
भारत में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ कई कानूनी प्रावधान हैं, जिनमें शामिल हैं:
- अनुच्छेद 15, 16 और 17:ये अनुच्छेद समानता, गैर-भेदभाव और अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देते हैं।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989:इस अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना है।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955:यह अधिनियम अस्पृश्यता के उन्मूलन और समानता के अधिकार की रक्षा करता है।
4 रोहिंग्या शरणार्थियों के मामले में भारत सरकार का क्या रुख है
भारत सरकार ने रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध प्रवासी करार देते हुए उन्हें देश से बाहर निकालने का प्रयास किया है। सरकार का तर्क है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की उपस्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी और उन्हें वापस उनके मूल देश म्यांमार भेजा जाएगा।
5 क्या है और इसकी स्थापना में भारत की क्या भूमिका थी
का पूरा नाम ‘अंतरराष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन सम्मेलन’ है। इसकी स्थापना 1965 में हुई थी। भारत ने 1960 के दशक में के निर्माण और मसौदा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी। भारत उन शुरुआती देशों में से एक था जिन्होंने इस सम्मेलन को अपनाया और लागू किया।
निष्कर्ष
विदेश मंत्रालय द्वारा की रिपोर्ट को खारिज करना भारत सरकार के उस रुख को दर्शाता है, जिसमें वह अपने संवैधानिक और कानूनी ढांचे के माध्यम से नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता को दोहराती है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अपनी लड़ाई को जारी रखेगी, लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिना पुष्ट प्रमाण के आरोपों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत सरकार संवैधानिक सुरक्षा उपायों, मजबूत कानूनी ढांचे और बहुलवाद के माध्यम से वंचित समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत सरकार समिति की टिप्पणियों का जवाब स्थापित प्रक्रिया के तहत देगी, न कि बिना पुष्ट प्रमाण के आरोपों के आधार पर।
इस मामले में भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि वह अपने आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगी। भारत सरकार ने यह भी बताया कि वह नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अपनी लड़ाई को जारी रखेगी, लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिना पुष्ट प्रमाण के आरोपों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
