केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है, जो सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियाँ प्राप्त करने और उनके पुनर्मूल्यांकन से संबंधित नियमों में बड़े बदलाव लाएगा। यह आदेश छात्रों के अधिकारों को मजबूत करने और मूल्यांकन प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आयोग ने सीबीएसई को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वह आरटीआई नियमों के अनुसार उत्तर पुस्तिकाओं की फोटोकॉपी के लिए निर्धारित शुल्क ही ले और उन छात्रों को पुनर्मूल्यांकन या सत्यापन के अवसर से वंचित न करे, जिन्होंने आरटीआई के माध्यम से अपनी उत्तर पुस्तिकाएँ प्राप्त की हैं। यह निर्णय सीबीएसई के मौजूदा नियमों पर सवाल उठाता है और आरटीआई अधिनियम की सर्वोच्चता को पुनः स्थापित करता है।
यह पूरा मामला एक कक्षा 10 के छात्र की आरटीआई याचिका से सामने आया, जिसने अपनी गणित मानक सेट-3 की उत्तर पुस्तिका की कॉपी मांगी थी। छात्र ने अपने अंकों में कटौती, पेपर की कठिनाई के स्तर और मॉडरेशन नीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सवाल उठाए थे। इस याचिका ने न केवल व्यक्तिगत छात्र की चिंता को उजागर किया, बल्कि एक व्यापक प्रणालीगत समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जहाँ छात्रों को अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया को समझने और उसमें सुधार की मांग करने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था। केंद्रीय सूचना आयोग ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए, छात्रों के हित में एक दूरगामी निर्णय लिया है, जिसका प्रभाव लाखों छात्रों पर पड़ेगा। यह आदेश शिक्षा प्रणाली में जवाबदेही और निष्पक्षता को बढ़ावा देने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
केंद्रीय सूचना आयोग का अहम आदेश और उसका संदर्भ
केंद्रीय सूचना आयोग का यह आदेश केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के उन छात्रों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है, जो अपनी बोर्ड परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियाँ प्राप्त करने और उनके मूल्यांकन की प्रक्रिया को समझने के लिए संघर्ष कर रहे थे। आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आरटीआई अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की फोटोकॉपी के लिए केवल वही शुल्क लिया जाना चाहिए जो आरटीआई नियम 2012 में निर्धारित है। यह निर्देश सीबीएसई द्वारा पहले से लिए जा रहे अत्यधिक शुल्क पर अंकुश लगाएगा, जिससे छात्रों पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ कम होगा। इसके अतिरिक्त, सीआईसी ने सीबीएसई के उस विवादास्पद नियम पर भी गंभीर आपत्ति जताई है, जिसके तहत आरटीआई के माध्यम से उत्तर पुस्तिका प्राप्त करने वाले छात्रों को बाद में उसके सत्यापन या पुनर्मूल्यांकन से रोक दिया जाता था। आयोग ने इस प्रावधान को आरटीआई कानून की मूल भावना के विपरीत बताया है और सीबीएसई को अपने नियमों में तत्काल संशोधन करने की सिफारिश की है।
यह मामला तब प्रकाश में आया जब कक्षा 10 के एक छात्र ने अपनी गणित मानक सेट-3 की उत्तर पुस्तिका की कॉपी मांगी। छात्र ने अपनी याचिका में पेपर की कठिनाई, मॉडरेशन नीति और मूल्यांकन के दौरान काटे गए अंकों से संबंधित कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए थे। छात्र का यह कदम न केवल उसके व्यक्तिगत अंकों की चिंता से प्रेरित था, बल्कि मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर एक व्यापक प्रश्न भी उठा रहा था। छात्र ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं तक पहुँचने के लिए आरटीआई कानून का सहारा लिया, क्योंकि उसे महसूस हुआ कि मौजूदा प्रक्रियाएँ पर्याप्त रूप से पारदर्शी नहीं थीं और उसमें सुधार की गुंजाइश थी। सीबीएसई के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने 2 जुलाई 2025 को बताया कि आवश्यक शुल्क जमा करने के बाद छात्र को उसकी उत्तर पुस्तिका की प्रतियाँ ईमेल के माध्यम से भेज दी गई थीं। इस एक छात्र की याचिका ने लाखों अन्य छात्रों के लिए एक मिसाल कायम की है, जो इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहे थे।
फीस का मुद्दा और छात्रों पर वित्तीय बोझ
छात्रों द्वारा आरटीआई के माध्यम से उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियाँ प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक अत्यधिक शुल्क था। छात्र के अनुसार, उसे पाँच विषयों की उत्तर पुस्तिकाएँ प्राप्त करने के लिए 2,500 रुपये, पुनर्सत्यापन के लिए 2,500 रुपये और प्रत्येक विषय के लिए 100 रुपये तक का शुल्क देना पड़ रहा था। इस प्रकार, पूरी प्रक्रिया का कुल खर्च लगभग 10,000 रुपये तक पहुँच सकता था। यह शुल्क संरचना न केवल छात्रों पर एक बड़ा वित्तीय बोझ डाल रही थी, बल्कि सूचना के अधिकार को भी सीमित कर रही थी, खासकर उन छात्रों के लिए जो आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। आरटीआई अधिनियम का मूल उद्देश्य नागरिकों को न्यूनतम शुल्क पर सरकारी जानकारी तक पहुँच प्रदान करना है, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। सीबीएसई द्वारा लिया जा रहा यह अत्यधिक शुल्क इस मूल सिद्धांत का उल्लंघन कर रहा था और छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की समीक्षा करने से हतोत्साहित कर रहा था।
केंद्रीय सूचना आयोग ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और सीबीएसई को स्पष्ट निर्देश दिए कि वह आरटीआई नियम 2012 में निर्धारित फोटोकॉपी फीस ही ले। आरटीआई नियम 2012 के तहत, जानकारी की फोटोकॉपी के लिए आमतौर पर प्रति पृष्ठ 2 रुपये का मामूली शुल्क निर्धारित होता है। सीबीएसई द्वारा पहले से वसूला जा रहा हजारों रुपये का शुल्क इस निर्धारित मानक से कहीं अधिक था। आयोग का यह निर्देश यह सुनिश्चित करेगा कि अब छात्र अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए केवल एक नाममात्र का शुल्क देंगे, जिससे यह प्रक्रिया सभी के लिए सुलभ हो सकेगी। यह कदम छात्रों को अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया की समीक्षा करने और यदि आवश्यक हो तो उसमें सुधार की मांग करने के लिए सशक्त करेगा, बिना किसी अनुचित वित्तीय बाधा के। यह शिक्षा प्रणाली में समानता और न्याय को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पुनर्मूल्यांकन पर प्रतिबंध: आरटीआई अधिनियम की भावना के विरुद्ध
केंद्रीय सूचना आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के एक अन्य विवादास्पद नियम पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। सीबीएसई ने 19 मई 2025 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यदि कोई छात्र आरटीआई अधिनियम के तहत अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्राप्त करता है, तो उसे बाद में उस उत्तर पुस्तिका के सत्यापन या पुनर्मूल्यांकन का अधिकार नहीं होगा। आयोग ने इस प्रावधान को आरटीआई कानून की मूल भावना के अनुरूप नहीं पाया। आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य नागरिकों को सरकारी निकायों द्वारा रखी गई जानकारी तक पहुँच प्रदान करना है, ताकि वे सूचित निर्णय ले सकें और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकें। किसी छात्र को उसकी उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्रदान करने के बाद उसे पुनर्मूल्यांकन के अधिकार से वंचित करना, सूचना के अधिकार के मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है।
सीआईसी ने तर्क दिया कि केवल आरटीआई के माध्यम से उत्तर पुस्तिका प्राप्त करने की वजह से छात्र को पुनर्मूल्यांकन से रोकना, उसे न्याय प्राप्त करने के एक महत्वपूर्ण अवसर से वंचित करना है। छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की समीक्षा करने और यदि उन्हें मूल्यांकन में कोई त्रुटि या विसंगति मिलती है, तो उसे चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए। यह अधिकार शिक्षा प्रणाली में विश्वास बनाए रखने और छात्रों को निष्पक्ष मूल्यांकन का आश्वासन देने के लिए आवश्यक है। सीबीएसई का यह नियम छात्रों के मन में संदेह पैदा कर सकता था और उन्हें अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच करने से हतोत्साहित कर सकता था, क्योंकि ऐसा करने पर वे पुनर्मूल्यांकन का महत्वपूर्ण विकल्प खो देते थे। आयोग के इस निर्देश से अब छात्र बिना किसी डर के अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियाँ प्राप्त कर सकेंगे और यदि आवश्यक हो तो पुनर्मूल्यांकन का अनुरोध भी कर सकेंगे, जिससे मूल्यांकन प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।
केंद्रीय सूचना आयोग का निर्देश और आरटीआई अधिनियम की सर्वोच्चता
केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने आदेश में आरटीआई अधिनियम की धारा 22 का विशेष रूप से हवाला दिया है। यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान किसी अन्य कानून में निहित किसी भी असंगत प्रावधान के बावजूद प्रभावी होंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के किसी नियम और आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के बीच कोई टकराव होता है, तो आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों को प्राथमिकता दी जाएगी और वे ही लागू होंगे। इस कानूनी आधार का उपयोग करते हुए, आयोग ने सीबीएसई को निर्देश दिया है कि वह आरटीआई नियम 2012 के अनुसार ही फोटोकॉपी फीस ले और 19 मई 2025 के सर्कुलर में आवश्यक संशोधन करे।
आयोग की यह सिफारिश केवल एक सुझाव नहीं है, बल्कि एक उच्च संवैधानिक निकाय द्वारा दिया गया एक मजबूत निर्देश है, जिसका पालन करना सीबीएसई के लिए अनिवार्य है। यह आदेश यह सुनिश्चित करेगा कि सीबीएसई के नियम आरटीआई कानून के अनुरूप रहें और छात्रों के सूचना के अधिकार का सम्मान किया जाए। आरटीआई अधिनियम की सर्वोच्चता को बनाए रखना न केवल छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देश में सुशासन और पारदर्शिता के व्यापक सिद्धांतों के लिए भी आवश्यक है। यह निर्णय सरकारी निकायों को यह याद दिलाता है कि उन्हें अपने नियमों और प्रक्रियाओं को स्थापित कानूनों के दायरे में रखना होगा और नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना होगा। इस आदेश से शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही का एक नया मानक स्थापित होगा और छात्रों को अपनी शैक्षणिक यात्रा में अधिक सशक्त महसूस करने का अवसर मिलेगा।
मुख्य तथ्य-सार
- केंद्रीय सूचना आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को आरटीआई के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की फोटोकॉपी के लिए आरटीआई नियम 2012 के अनुसार शुल्क लेने का निर्देश दिया।
- आयोग ने सीबीएसई के उस नियम पर आपत्ति जताई जिसमें आरटीआई के माध्यम से कॉपी लेने वाले छात्रों को पुनर्मूल्यांकन से रोका गया था।
- यह मामला कक्षा 10 के एक छात्र की आरटीआई याचिका से सामने आया, जिसने गणित मानक सेट-3 की अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी मांगी थी।
- छात्र के अनुसार, पाँच विषयों की उत्तर पुस्तिका के लिए 2,500 रुपये, पुनर्सत्यापन के लिए 2,500 रुपये और प्रति विषय 100 रुपये तक शुल्क लिया जा रहा था, जिससे कुल खर्च लगभग 10,000 रुपये तक पहुँच सकता था।
- सीबीएसई के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी ने 2 जुलाई 2025 को छात्र को ईमेल के माध्यम से उत्तर पुस्तिका की प्रतियाँ भेजी थीं।
- सीबीएसई ने 19 मई 2025 के सर्कुलर का हवाला दिया था, जिसमें आरटीआई के तहत कॉपी लेने के बाद पुनर्मूल्यांकन की अनुमति नहीं थी।
- केंद्रीय सूचना आयोग ने आरटीआई अधिनियम की धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि टकराव की स्थिति में आरटीआई कानून को प्राथमिकता मिलेगी।
- सीबीएसई को 19 मई 2025 के सर्कुलर में आवश्यक संशोधन करने की सिफारिश की गई है ताकि उसके नियम आरटीआई कानून के अनुरूप रह सकें।
| मुद्दा | पहले की स्थिति (सीआईसी के आदेश से पूर्व) | सीआईसी के निर्देश के बाद की स्थिति |
|---|---|---|
| उत्तर पुस्तिका की कॉपी के लिए शुल्क | अत्यधिक शुल्क (उदाहरण: पाँच विषयों के लिए 2,500 रुपये, पुनर्सत्यापन के लिए 2,500 रुपये, कुल लगभग 10,000 रुपये तक) | आरटीआई नियम 2012 के अनुसार निर्धारित न्यूनतम शुल्क (प्रति पृष्ठ 2 रुपये) |
| आरटीआई के माध्यम से कॉपी प्राप्त करने के बाद पुनर्मूल्यांकन | सीबीएसई के 19 मई 2025 के सर्कुलर के अनुसार अनुमति नहीं थी। | पुनर्मूल्यांकन या सत्यापन का अधिकार बरकरार रहेगा। सीबीएसई को नियम में संशोधन करना होगा। |
| नियमों की प्राथमिकता | सीबीएसई के अपने नियम (जैसे 19 मई 2025 का सर्कुलर) प्रभावी थे। | आरटीआई अधिनियम की धारा 22 के तहत आरटीआई कानून को प्राथमिकता मिलेगी। |
| छात्रों पर वित्तीय बोझ | अत्यधिक शुल्क के कारण छात्रों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता था, जिससे सूचना तक पहुँच सीमित होती थी। | न्यूनतम शुल्क के कारण वित्तीय बोझ कम होगा, जिससे सभी छात्रों के लिए सूचना सुलभ होगी। |
| पारदर्शिता और जवाबदेही | सीमित पारदर्शिता और मूल्यांकन प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न। | अधिक पारदर्शिता, मूल्यांकन प्रक्रिया में जवाबदेही और छात्रों के अधिकारों का संरक्षण। |
केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
प्रश्न: केंद्रीय सूचना आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को क्या मुख्य निर्देश दिए हैं
उत्तर:केंद्रीय सूचना आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को दो प्रमुख निर्देश दिए हैं। पहला, आरटीआई अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की फोटोकॉपी के लिए आरटीआई नियम 2012 में निर्धारित शुल्क ही लिया जाए। दूसरा, सीबीएसई अपने उस नियम में संशोधन करे जिसके तहत आरटीआई के माध्यम से उत्तर पुस्तिका प्राप्त करने वाले छात्रों को बाद में पुनर्मूल्यांकन या सत्यापन का अवसर नहीं दिया जाता था। आयोग ने इस प्रावधान को आरटीआई कानून की भावना के विपरीत बताया है और इसे छात्रों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन माना है।
प्रश्न: यह मामला किस प्रकार सामने आया और इसमें छात्रों को क्या समस्याएँ आ रही थीं
उत्तर:यह मामला केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कक्षा 10 के एक छात्र की आरटीआई याचिका के माध्यम से सामने आया। छात्र ने अपनी गणित मानक सेट-3 की उत्तर पुस्तिका की कॉपी मांगी थी और मूल्यांकन प्रक्रिया में काटे गए अंकों तथा मॉडरेशन नीति पर सवाल उठाए थे। छात्र के अनुसार, उसे पाँच विषयों की उत्तर पुस्तिकाएँ प्राप्त करने के लिए 2,500 रुपये, पुनर्सत्यापन के लिए 2,500 रुपये और प्रत्येक विषय के लिए 100 रुपये तक का शुल्क देना पड़ रहा था, जिससे कुल खर्च लगभग 10,000 रुपये तक पहुँच सकता था। यह अत्यधिक शुल्क छात्रों पर एक बड़ा वित्तीय बोझ डाल रहा था और उन्हें अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया की समीक्षा करने से हतोत्साहित कर रहा था।
प्रश्न: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का वह कौन सा नियम था जिस पर केंद्रीय सूचना आयोग ने आपत्ति जताई
उत्तर:केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने 19 मई 2025 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें यह प्रावधान था कि यदि कोई छात्र आरटीआई अधिनियम के तहत अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्राप्त करता है, तो उसे बाद में उस उत्तर पुस्तिका के सत्यापन या पुनर्मूल्यांकन का अधिकार नहीं होगा। केंद्रीय सूचना आयोग ने इस नियम पर कड़ी आपत्ति जताई, यह कहते हुए कि केवल आरटीआई के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने के कारण किसी छात्र को उसके पुनर्मूल्यांकन के अधिकार से वंचित करना आरटीआई कानून की मूल भावना और उद्देश्य के अनुरूप नहीं है। आयोग ने इसे छात्रों के न्याय के अधिकार का उल्लंघन माना।
प्रश्न: केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने निर्देश के लिए किस कानूनी प्रावधान का हवाला दिया
उत्तर:केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने निर्देश के लिए आरटीआई अधिनियम की धारा 22 का हवाला दिया। इस धारा के अनुसार, सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान किसी अन्य कानून में निहित किसी भी असंगत प्रावधान के बावजूद प्रभावी होंगे। इसका अर्थ यह है कि यदि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के किसी नियम और आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के बीच कोई टकराव होता है, तो आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसी आधार पर आयोग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को अपने नियमों में संशोधन करने की सिफारिश की है ताकि वे आरटीआई कानून के अनुरूप हो सकें।
प्रश्न: केंद्रीय सूचना आयोग के इस आदेश का छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा
उत्तर:केंद्रीय सूचना आयोग के इस आदेश का छात्रों पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अब छात्र आरटीआई अधिनियम के तहत अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की कॉपी प्राप्त करने के लिए केवल आरटीआई नियम 2012 में निर्धारित न्यूनतम शुल्क का भुगतान करेंगे, जिससे उन पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ काफी कम होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरटीआई के माध्यम से कॉपी प्राप्त करने के बाद भी छात्र अपनी उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन या पुनर्मूल्यांकन का अधिकार नहीं खोएँगे। यह आदेश शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता को बढ़ावा देगा, छात्रों को अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया के संबंध में अधिक जवाबदेही प्राप्त करने में मदद करेगा, और उन्हें निष्पक्षता व न्याय सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करेगा। यह छात्रों के अधिकारों को सशक्त करेगा।
निष्कर्ष
केंद्रीय सूचना आयोग का यह आदेश केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता तथा जवाबदेही को बढ़ावा देने की दिशा में एक मील का पत्थर है। आयोग ने न केवल आरटीआई के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए लगने वाले अत्यधिक शुल्क पर अंकुश लगाया है, बल्कि उस विवादास्पद नियम को भी चुनौती दी है जो आरटीआई के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने वाले छात्रों को पुनर्मूल्यांकन के अधिकार से वंचित करता था। आरटीआई अधिनियम की धारा 22 का हवाला देकर, सीआईसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छात्रों के सूचना के अधिकार को किसी भी बोर्ड के आंतरिक नियमों से ऊपर रखा जाएगा। यह निर्णय लाखों छात्रों को अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया को समझने, उसमें संभावित त्रुटियों को इंगित करने और न्याय प्राप्त करने के लिए सशक्त करेगा। यह आदेश यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा प्रणाली अधिक निष्पक्ष, सुलभ और पारदर्शी बने, जिससे छात्रों का इसमें विश्वास और मजबूत हो सके। यह एक ऐसा कदम है जो न केवल व्यक्तिगत छात्रों को लाभान्वित करेगा, बल्कि पूरे शैक्षणिक परिदृश्य में सकारात्मक बदलाव लाएगा, जहाँ सूचना का अधिकार एक वास्तविक और प्रभावी उपकरण बन सकेगा।
