सोमवार, 7 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में आयोजित पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों पर एक महत्वपूर्ण परामर्श समिति की बैठक की अध्यक्षता करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने क्षेत्र में जारी संघर्ष के बावजूद भारत की कूटनीतिक सफलता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने समिति को बताया कि कैसे पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध की स्थिति के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने, ऊर्जा आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखने और खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सफल रहा। जयशंकर के अनुसार, इस संकट के बीच भारत ने न तो तेल-गैस पर कोई बड़ा संकट देखा और न ही भारतीयों को किसी बड़े नुकसान का सामना करना पड़ा, जो भारत की प्रभावी विदेश नीति का प्रमाण है।
यह बैठक ऐसे समय में हुई जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और कई देशों के बीच तनाव चरम पर है। इस पृष्ठभूमि में, भारत के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक हितों और प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत ने इन चुनौतियों का सामना अपनी बहुआयामी कूटनीति और रणनीतिक संबंधों के माध्यम से किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया-उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र के साथ गहरे और ऐतिहासिक संबंध हैं, जिनमें व्यापार, निवेश, ऊर्जा, समुद्री सहयोग और लोगों के बीच संबंध शामिल हैं। इन संबंधों को और मजबूत करना भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है, जिसने संकट के समय में भी स्थिरता बनाए रखने में मदद की।
भारत की कूटनीतिक सफलता और राष्ट्रीय हित
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने परामर्श समिति की बैठक में स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। उन्होंने बताया कि भारत की कूटनीति इस संकट के बीच भी प्रभावी साबित हुई, जिससे देश को किसी बड़े आर्थिक या सामाजिक नुकसान से बचाया जा सका। जयशंकर ने विशेष रूप से दो प्रमुख क्षेत्रों पर प्रकाश डाला: खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और देश की ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता। उन्होंने कहा कि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता मौजूदा अशांति के समय में प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आवश्यक सामान की आपूर्ति बनाए रखना था, और भारत इन दोनों मोर्चों पर सफल रहा।
भारत के पश्चिम एशिया के साथ संबंध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी हैं। यह क्षेत्र भारत के लिए ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत होने के साथ-साथ लाखों भारतीय प्रवासियों का घर भी है, जो अपनी मेहनत और लगन से इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और भारत को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भेजते हैं। ऐसे में, क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर भारत पर पड़ना स्वाभाविक था। हालांकि, जयशंकर ने बताया कि भारत ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए इन संभावित प्रभावों को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया। उन्होंने एक्स पर भी इस बात पर जोर दिया कि भारत के खाड़ी और पश्चिम एशिया-उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र के साथ व्यापार, निवेश, ऊर्जा, समुद्री सहयोग और लोगों के बीच संबंधों में लंबे समय से चली आ रही साझेदारी और सहयोग है, जिसे मौजूदा परिस्थितियों में और मजबूत किया गया है। यह दर्शाता है कि भारत ने केवल संकट का प्रबंधन नहीं किया, बल्कि अपने संबंधों को और गहरा करने का अवसर भी देखा।
ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण
पश्चिम एशिया में संघर्ष का एक सबसे बड़ा वैश्विक प्रभाव ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है, क्योंकि यह क्षेत्र दुनिया के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है। भारत, अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के कारण, इस क्षेत्र से बड़े पैमाने पर तेल और गैस का आयात करता है। परामर्श समिति की बैठक में कई सांसदों ने पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और भारत की ऊर्जा जरूरतों का मुद्दा उठाया। विदेश मंत्री जयशंकर ने सांसदों को आश्वस्त किया कि संकट के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को अलग-अलग कर रहा है, ताकि किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता कम हो। यह विविधीकरण रणनीति भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचाने में सहायक सिद्ध हुई है।
जयशंकर ने यह भी बताया कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसके संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। यह अद्वितीय स्थिति भारत को जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्यों में भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में लचीलापन प्रदान करती है। उन्होंने संघर्ष के बाद ईरान से तेल और अन्य सामान खरीदने पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों का भी जिक्र किया, लेकिन भारत ने अपनी कूटनीतिक क्षमता का उपयोग करते हुए इन चुनौतियों के बीच भी अपनी आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखा। हालांकि कुछ रिपोर्टों में मार्च से अगस्त 2026 के बीच होर्मुज संकट के कारण भारत के ईंधन आयात पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात कही गई थी, जयशंकर के बयान से यह स्पष्ट होता है कि भारत ने अपनी रणनीतिक खरीद और विविधीकरण के माध्यम से इस संभावित संकट को एक बड़े राष्ट्रीय संकट में बदलने से रोका। ओमान-भारत गैस पाइपलाइन जैसे प्रस्ताव भी भविष्य में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं, जिससे लंबी अवधि में आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता सुनिश्चित की जा सकेगी।
प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: एक करोड़ भारतीयों का ख्याल
खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते हैं, जो वहां की अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और भारत के लिए विदेशी मुद्रा का एक प्रमुख स्रोत हैं। पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार का संघर्ष इन प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और कल्याण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। विदेश मंत्री जयशंकर ने परामर्श समिति को बताया कि भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक इन लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत ने खाड़ी देशों में अपने प्रवासियों को सुरक्षित रखा है और उन्हें किसी बड़े नुकसान का सामना नहीं करने दिया।
सरकार ने मौजूदा अशांति के समय में प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और जरूरी सामान की आपूर्ति बनाए रखने के लिए सक्रिय कदम उठाए। इसमें संबंधित देशों के साथ निरंतर संपर्क स्थापित करना, दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के माध्यम से भारतीय समुदाय के साथ संवाद बनाए रखना और किसी भी आपात स्थिति के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार करना शामिल था। भारत ने इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक संबंधों को और मजबूत किया, जिससे संकट के समय में भी भारतीय नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कूटनीतिक हस्तक्षेप संभव हो सका। यह भारत की पीपल-टू-पीपल (लोगों से लोगों के बीच) संबंधों की नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो न केवल आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा देता है, बल्कि मानवीय सरोकारों को भी प्राथमिकता देता है। प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत की विदेश नीति का एक मानवीय और नैतिक दायित्व है, जिसे सरकार ने सफलतापूर्वक निभाया।
पश्चिम एशिया में बदलते समीकरण और मक्का समझौता
पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदल रहा है, और नए गठबंधन तथा समझौते इस क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। परामर्श समिति की बैठक में कुछ सांसदों ने मक्का रक्षा समझौते को लेकर चिंता जताई और भारत का रुख पूछा। यह समझौता 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था, जिसमें कहा गया है कि यदि इनमें से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यह कदम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सुरक्षा के लिए उठाया गया है और इसके क्षेत्रीय निहितार्थ हो सकते हैं।
भारत, एक प्रमुख क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति के रूप में, पश्चिम एशिया में इन बदलते समीकरणों पर बारीकी से नजर रखता है। जयशंकर ने बताया कि भारत ने इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक संबंधों को और मजबूत किया है, जो उसे विभिन्न क्षेत्रीय गुटों के बीच संतुलन बनाने और अपने हितों की रक्षा करने में मदद करता है। मक्का समझौते जैसे घटनाक्रम क्षेत्र में नए सुरक्षा ढांचों के उद्भव का संकेत देते हैं, और भारत को अपनी विदेश नीति को इन परिवर्तनों के अनुरूप ढालना होगा। भारत की रणनीति हमेशा से सभी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की रही है, जिससे वह किसी भी एक गुट का हिस्सा बने बिना अपने हितों को साध सके। यह दृष्टिकोण भारत को क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने में एक रचनात्मक भूमिका निभाने में सक्षम बनाता है, जबकि साथ ही अपनी ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के कल्याण को भी सुनिश्चित करता है।
तथ्य-सार: पश्चिम एशिया संकट और भारत की प्रतिक्रिया
- विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 7 सितंबर, 2026 को पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों पर परामर्श समिति की बैठक की अध्यक्षता की।
- जयशंकर ने बताया कि मिडिल ईस्ट में जारी जंग का भारत पर असर नहीं पड़ा, न तेल-गैस पर संकट आया और न ही भारतीयों को बड़ा नुकसान हुआ।
- भारत ने खाड़ी देशों में प्रवासियों को सुरक्षित रखा और ऊर्जा आपूर्ति भी निर्बाध बनाए रखी।
- भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को अलग-अलग कर रहा है ताकि निर्भरता कम हो।
- भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसके अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे संबंध हैं।
- खाड़ी देशों में रह रहे लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया गया।
- कुछ सांसदों ने 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा हस्ताक्षरित मक्का रक्षा समझौते पर चिंता जताई।
तुलनात्मक तालिका: पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारत की रणनीति और परिणाम
| रणनीति का मुख्य स्तंभ | विवरण | प्राप्त परिणाम (जयशंकर के अनुसार) |
|---|---|---|
| ऊर्जा सुरक्षा का विविधीकरण | भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को अलगअलग किया, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे संबंध बनाए रखे। | तेल और गैस पर कोई संकट नहीं आया, ऊर्जा आपूर्ति निर्बाध बनी रही। |
| प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा | खाड़ी देशों में रह रहे लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। | लाखों भारतीय प्रवासियों को सुरक्षित रखा गया, उन्हें कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। |
| मजबूत राजनीतिक संबंध | पश्चिम एशिया क्षेत्र में अपने राजनीतिक संबंधों को और मजबूत किया, जिससे कूटनीतिक पैंतरेबाज़ी की गुंजाइश बनी रही। | भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सफल रहा, कूटनीति प्रभावी साबित हुई। |
| आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति | मौजूदा अशांति के समय आवश्यक सामान की आपूर्ति बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया। | देश में जरूरी सामान की आपूर्ति श्रृंखला बाधित नहीं हुई, स्थिरता बनी रही। |
पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारत ने अपने हितों की रक्षा कैसे की
विदेश मंत्री एस जयशंकर के अनुसार, भारत ने पश्चिम एशिया संकट के दौरान अपने हितों की रक्षा कई रणनीतिक कदमों के माध्यम से की। इसमें खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग एक करोड़ भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, देश की ऊर्जा आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखना और अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना शामिल था। भारत ने अपनी कूटनीतिक क्षमता का उपयोग करते हुए क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे, जिससे उसे संकट के बीच भी संतुलन स्थापित करने और अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद मिली। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत की कूटनीति इस दौरान सफल रही, जिससे देश को किसी बड़े नुकसान से बचाया जा सका।
भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को कैसे सुरक्षित रखा
भारत ने पश्चिम एशिया संकट के बावजूद अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाई। विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया कि भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को अलग-अलग किया, जिससे किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके। इसके अतिरिक्त, भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अपने अच्छे संबंधों का लाभ उठाया, जिससे उसे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान से तेल और अन्य सामान की खरीद के संबंध में लचीलापन मिला। इस रणनीतिक विविधीकरण और मजबूत कूटनीतिक संबंधों के कारण, भारत को तेल और गैस पर कोई बड़ा संकट नहीं झेलना पड़ा और ऊर्जा आपूर्ति निर्बाध बनी रही।
प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए सरकार की क्या प्राथमिकता थी
पश्चिम एशिया में रहने वाले लगभग एक करोड़ भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक थी। विदेश मंत्री जयशंकर ने परामर्श समिति को बताया कि सरकार ने मौजूदा अशांति के समय में इन लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके कल्याण का ख्याल रखने पर विशेष ध्यान दिया। सरकार ने खाड़ी देशों में अपने दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के माध्यम से भारतीय समुदाय के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखा और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाए। मजबूत राजनीतिक संबंधों के माध्यम से, भारत ने यह सुनिश्चित किया कि उसके प्रवासी नागरिकों को कोई बड़ा नुकसान न हो और वे सुरक्षित रहें।
मक्का रक्षा समझौता क्या है और भारत का इस पर क्या रुख है
मक्का रक्षा समझौता 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा हस्ताक्षरित एक सुरक्षा समझौता है। इस समझौते में यह प्रावधान है कि यदि इनमें से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह समझौता पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है। परामर्श समिति की बैठक में कुछ सांसदों ने इस समझौते को लेकर चिंता व्यक्त की और भारत का रुख जानना चाहा। हालांकि, स्रोत में भारत के आधिकारिक रुख का सीधा उल्लेख नहीं है, विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया कि भारत ने इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक संबंधों को और मजबूत किया है, जिससे वह ऐसे बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्यों में अपने हितों की रक्षा कर सके और क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान दे सके।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद, भारत ने अपनी कुशल कूटनीति और रणनीतिक दूरदर्शिता के माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों की सफलतापूर्वक रक्षा की है। विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा 7 सितंबर, 2026 को परामर्श समिति की बैठक में दिए गए बयानों से यह स्पष्ट होता है कि भारत ने न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित किया, बल्कि खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग एक करोड़ भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी। ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों का विविधीकरण, संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना, तथा क्षेत्र में राजनीतिक संबंधों को और गहरा करना भारत की इस सफलता के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। मक्का रक्षा समझौते जैसे क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखते हुए, भारत अपनी विदेश नीति को लचीला बनाए हुए है, ताकि वह बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढल सके और क्षेत्र में शांति व स्थिरता को बढ़ावा दे सके। यह संकट भारत की विदेश नीति की परिपक्वता और उसकी क्षमता को दर्शाता है कि वह जटिल वैश्विक चुनौतियों के बीच भी अपने नागरिकों और राष्ट्रीय हितों की प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकता है।
