केरल विश्वविद्यालय के कुलपति के विवादित बयान ने पूरे देश में मचाई हलचल
15 अगस्त 2026 के स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान केरल विश्वविद्यालय के कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल द्वारा दिए गए विवादित बयान ने पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक हलचल मचा दी है। मणिविला में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल ने कहा कि जो लोग ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाते या नहीं कहते, वे अपनी मां को नहीं पहचानते। उनके इस बयान ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच गरमागरमी पैदा कर दी है, बल्कि शिक्षा जगत में भी एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल ने अपने भाषण में कहा कि भारत माता ने ही बच्चों को माता-पिता के पास सौंपा है और ये बच्चे विकसित भारत बनाने के लिए हमारे घरों में भेजे गए हैं। उन्होंने आगे कहा कि होशियार और अच्छे नागरिक बनाने की जिम्मेदारी घर के हर पुरुष और महिला मुखिया की होती है, खासकर मां की। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को भारत माता के प्रति सम्मान का प्रतीक बताया।
उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने उन पर ‘भगवाकरण’ का आरोप लगाया है। केरल के राज्यपाल द्वारा उन्हें कुलपति नियुक्त किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। वहीं, केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद राज्य सरकार ने अपने आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ का गायन नहीं किया था, जिससे भी राजनीतिक गरमागरमी बढ़ गई है।
इस पूरे मामले ने ‘वंदे मातरम्’ के महत्व, इसके राजनीतिकरण और शिक्षा जगत में इसकी भूमिका पर एक नया बहस छेड़ दिया है।
कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल का पूरा बयान
- मुख्य बिंदु:जो लोग ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाते या नहीं कहते, वे अपनी मां को नहीं पहचानते।
- तर्क:भारत माता ने ही बच्चों को माता-पिता के पास सौंपा है और ये बच्चे विकसित भारत बनाने के लिए हमारे घरों में भेजे गए हैं।
- जिम्मेदारी:होशियार और अच्छे नागरिक बनाने की जिम्मेदारी घर के हर पुरुष और महिला मुखिया की होती है, खासकर मां की।
- भारत माता:देश को ‘भारत माता’ कहा जाता है, इसलिए ‘वंदे मातरम्’ हमारी मां के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
- विरोधियों पर आरोप:जो लोग ‘वंदे मातरम्’ का विरोध करते हैं, वे नहीं जानते कि उनकी मां कौन है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। केरल के प्रमुख विपक्षी दल लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने उनके खिलाफ आरोप लगाया है कि वे केरल विश्वविद्यालय में आरएसएस के एजेंडे को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं।
एलडीएफ और यूडीएफ ने कहा कि राज्यपाल द्वारा मोहनन कुन्नुम्मल को कुलपति नियुक्त किए जाने पर भी सवाल उठाए गए थे। उनका आरोप है कि राज्यपाल ने राजनीतिक दबाव में आकर इस नियुक्ति को मंजूरी दी है।
विपक्षी दलों का कहना है कि कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल केरल की शिक्षा व्यवस्था को ‘भगवा रंग’ देने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रयास शिक्षा जगत में धार्मिक और राजनीतिक हस्तक्षेप का एक नया उदाहरण है।
सरकारी पक्ष का रुख
केरल सरकार ने कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद राज्य सरकार ने अपने आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ का गायन नहीं किया था।
केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसे सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में गाया जाना चाहिए। हालांकि, केरल सरकार ने इस निर्देश का पालन नहीं किया, जिससे राजनीतिक गरमागरमी और बढ़ गई है।
केंद्र सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है और इसे सभी नागरिकों द्वारा सम्मानपूर्वक गाया जाना चाहिए।
‘वंदे मातरम्’ का महत्व और विवाद
‘वंदे मातरम्’ भारत का राष्ट्रगीत नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और इसे पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था।
स्वतंत्रता के बाद, ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। हालांकि, इसके बावजूद ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहसें होती रहती हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ में धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को उजागर किया गया है, जबकि अन्य का कहना है कि यह देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है।
‘वंदे मातरम्’ विवाद: प्रमुख पक्ष और उनके तर्क
‘वंदे मातरम्’ विवाद से जुड़े प्रमुख सवाल और उनके जवाब
| पक्ष | तर्क | उदाहरण |
|---|---|---|
| कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल और सरकारी पक्ष | ‘वंदे मातरम्’ देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान का प्रतीक है।जो लोग इसे नहीं गाते, वे अपनी मां को नहीं पहचानते।विकसित भारत के निर्माण में ‘वंदे मातरम्’ का महत्वपूर्ण योगदान है। | केरल विश्वविद्यालय के कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल का बयान।केंद्र सरकार का निर्देश कि सभी संस्थानों में ‘वंदे मातरम्’ गाया जाना चाहिए। |
| विपक्षी दल (एलडीएफ, यूडीएफ) | कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल केरल की शिक्षा व्यवस्था को ‘भगवा रंग’ देने का प्रयास कर रहे हैं।राज्यपाल द्वारा उनकी नियुक्ति राजनीतिक दबाव का परिणाम है।‘वंदे मातरम्’ का राजनीतिकरण किया जा रहा है। | एलडीएफ और यूडीएफ द्वारा लगाए गए ‘भगवाकरण’ के आरोप।राज्यपाल द्वारा कुलपति नियुक्ति पर उठाए गए सवाल। |
| कांग्रेस पार्टी | ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर कोई आपत्ति नहीं है।स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ गाया गया था।बीजेपी द्वारा लगाए गए आरोप निराधार हैं। | कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम्’ का गायन।जयराम रमेश द्वारा बीजेपी के आरोपों का खंडन। |
| भाजपा | ‘वंदे मातरम्’ देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है।इसके पूर्ण संस्करण का सम्मान किया जाना चाहिए।कांग्रेस द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के प्रति उदासीनता दिखाई गई है। | बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी द्वारा लगाए गए आरोप।लाल किले पर पहली बार ‘वंदे मातरम्’ का गायन। |
1 कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर ऐसा विवादित बयान क्यों दिया
कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल ने अपने भाषण में ‘वंदे मातरम्’ को भारत माता के प्रति सम्मान का प्रतीक बताया। उनका मानना है कि जो लोग ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाते, वे अपनी मां को नहीं पहचानते। उनका यह बयान देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिया गया था।
2 विपक्षी दलों ने कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल पर ‘भगवाकरण’ का आरोप क्यों लगाया है
विपक्षी दलों का आरोप है कि कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल केरल विश्वविद्यालय में आरएसएस के एजेंडे को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह प्रयास शिक्षा जगत में धार्मिक और राजनीतिक हस्तक्षेप का एक नया उदाहरण है।
3 ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत क्यों नहीं है
स्वतंत्रता के बाद, ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। हालांकि, ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहसें होती रहती हैं।
4 केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर क्या निर्देश जारी किए हैं
केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसे सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में गाया जाना चाहिए। हालांकि, केरल सरकार ने इस निर्देश का पालन नहीं किया।
5 ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर क्या विवाद है
कुछ लोगों का मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण में धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को उजागर किया गया है, जबकि अन्य का कहना है कि इसे देश की एकता और अखंडता का प्रतीक माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
केरल विश्वविद्यालय के कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल द्वारा दिया गया ‘वंदे मातरम्’ को लेकर विवादित बयान पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक हलचल मचा चुका है। जहां एक तरफ सरकारी पक्ष इसे देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान का प्रतीक मानता है, वहीं विपक्षी दलों ने इसे ‘भगवाकरण’ का प्रयास बताया है।
इस पूरे मामले ने ‘वंदे मातरम्’ के महत्व, इसके राजनीतिकरण और शिक्षा जगत में इसकी भूमिका पर एक नया बहस छेड़ दिया है। कुलपति मोहनन कुन्नुम्मल के बयान ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच गरमागरमी पैदा कर दी है, बल्कि शिक्षा जगत में भी एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
इस विवाद के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि ‘वंदे मातरम्’ न केवल एक गीत है, बल्कि देश की एकता और अखंडता का प्रतीक भी है। इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहसें होती रहेंगी, लेकिन इसका सम्मान किया जाना चाहिए।
केरल सरकार और केंद्र सरकार के बीच ‘वंदे मातरम्’ को लेकर चल रही राजनीतिक गरमागरमी के बीच यह जरूरी है कि सभी पक्ष मिलकर इस मुद्दे पर शांतिपूर्ण और सार्थक चर्चा करें। ‘वंदे मातरम्’ देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है, और इसे सभी नागरिकों द्वारा सम्मानपूर्वक गाया जाना चाहिए।
