अफगानिस्तान में तालिबान के पांच साल: युद्ध थमा मगर संकट बढ़ा
15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान का कब्जा हो गया था। अमेरिकी और नाटो सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्तान में दो दशक पुरानी व्यवस्था ढह गई और तालिबान फिर से सत्ता में लौटा। पांच साल बाद अफगानिस्तान की तस्वीर काफी बदल चुकी है। बड़े पैमाने पर लड़ाई और लगातार होने वाले हमलों में कमी आई है, मगर इसके साथ ही देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट और महिलाओं पर पाबंदियां बढ़ गई हैं। युद्ध का शोर थमा मगर आम लोगों का संकट खत्म नहीं हुआ है।
तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों के अधिकार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। लड़कियों को छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से रोक दिया गया और महिलाओं के लिए विश्वविद्यालयों के दरवाजे बंद कर दिए गए। उन्हें सरकारी नौकरियों और कई अन्य क्षेत्रों से बाहर कर दिया गया। 2022 में पार्क और जिम जैसी सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 2024 में तो महिलाओं के सार्वजनिक रूप से तेज आवाज में बोलने तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अनुसार, तालिबान ने सत्ता में लौटने के बाद महिलाओं के अधिकारों को सीमित करने वाले 100 से ज्यादा फरमान जारी किए हैं। 3,200 से ज्यादा महिलाओं के सर्वेक्षण में आधे से अधिक महिलाओं ने बताया कि वे अब महीने में सिर्फ एक या दो बार ही घर से बाहर निकल पाती हैं। 70 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी मानसिक स्थिति को खराब या बहुत खराब बताया है। लड़कियों की शिक्षा पर लगे प्रतिबंधों का असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ने वाला है।
यूनेस्को के अनुसार, अफगानिस्तान में लगभग 24 लाख लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से बाहर हैं। अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों और महिलाओं को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से इस तरह रोका गया है। इसका आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। तालिबान के आने से पहले अफगानिस्तान में लगभग हर छह महिलाओं में से एक काम करती थी, जो अब घटकर लगभग हर 20 महिलाओं में एक रह गई है। महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा और रोजगार से बाहर रखने की कीमत अफगानिस्तान को सालाना कम से कम 8 4 करोड़ डॉलर पड़ रही है।
अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं हुई है। विश्व बैंक के अनुसार, 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक जीडीपी में लगभग 4 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2026 में भी लगभग 4 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान है। मगर यह वृद्धि आम लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
2026 में अफगानिस्तान की लगभग 45 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 2 19 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है। इनमें लगभग 1 16 करोड़ बच्चे शामिल हैं। यूनिसेफ के अनुसार, देश की मानवीय जरूरतें प्राकृतिक आपदाओं, सूखे, कमजोर अर्थव्यवस्था, सीमित सरकारी सेवाओं और महिलाओं पर पाबंदियों के कारण और बढ़ गई हैं।
तालिबान के सत्ता में आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मदद में बड़े बदलाव आए हैं। अमेरिका ने अक्टूबर 2021 से दिसंबर 2024 के बीच अफगानिस्तान को 3 अरब डॉलर से ज्यादा की मानवीय और विकास सहायता दी थी। मगर जनवरी 2025 में ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान के लिए अमेरिकी मानवीय फंडिंग रोक दी। यह मदद अफगानिस्तान को मिलने वाली मानवीय सहायता का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा थी।
2026 में संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान के लिए 1 7 अरब डॉलर की मानवीय अपील की थी, मगर 14 अगस्त तक इसका सिर्फ 25 प्रतिशत फंड ही मिल पाया था। महिला संगठनों की स्थिति भी खराब है। 74 संगठनों के सर्वेक्षण में आधे से ज्यादा संगठनों ने कहा कि वे अगले एक साल में अपना काम बंद कर सकते हैं।
पाकिस्तान और ईरान से बड़ी संख्या में अफगान नागरिकों की वापसी ने अफगानिस्तान के संकट को और बढ़ा दिया है। 2023 से अब तक लगभग 60 लाख लोग अफगानिस्तान लौट चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि मई से दिसंबर 2026 के बीच लगभग 27 लाख और लोग अफगानिस्तान लौट सकते हैं। इससे घर, नौकरी, स्कूल और अस्पतालों पर और दबाव पड़ेगा।
तालिबान को अभी तक व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है, मगर दुनिया का रवैया धीरे-धीरे बदल रहा है। भारत, चीन, ईरान, कतर और मध्य एशिया के देशों ने तालिबान से संपर्क बढ़ाया है। रूस ने पिछले साल तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दी थी और हाल में सैन्य सहयोग समझौता भी किया है। यूरोपीय संघ ने भी तालिबान अधिकारियों से बातचीत की है।
इसके पीछे सुरक्षा, प्रवासन, व्यापार, खनिज संसाधन और क्षेत्रीय राजनीति जैसे कारण हैं। मगर मानवाधिकार संगठन चिंता जता रहे हैं कि अगर दुनिया तालिबान से संपर्क बढ़ाती है और महिलाओं के अधिकारों को शर्त नहीं बनाती, तो उस पर सुधार का दबाव कमजोर हो सकता है।
तालिबान के नजरिए से सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने पांच साल तक सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी है और बड़े पैमाने की लड़ाई पहले की तुलना में कम हुई है। आम लोगों के कुछ हिस्से भी पहले की तुलना में सड़कों पर ज्यादा सुरक्षा महसूस करते हैं। मगर सुरक्षा और स्थिरता एक ही चीज नहीं हैं।
अगर अर्थव्यवस्था लोगों की आय नहीं बढ़ा पा रही, लाखों लोगों को भोजन और स्वास्थ्य सहायता चाहिए, लड़कियां स्कूल नहीं जा सकतीं और महिलाओं की आधी आबादी सार्वजनिक जीवन से बाहर है, तो केवल सत्ता पर नियंत्रण को स्थिरता नहीं कहा जा सकता। विश्व बैंक भी कहता है कि आर्थिक वृद्धि हो रही है, मगर वह बेहतर जीवन स्तर और ज्यादा आय में नहीं बदल रही। पांच साल बाद अफगानिस्तान की सबसे बड़ी कहानी यही है। तालिबान सत्ता में टिका रहा मगर देश अभी भी अपने लोगों को बेहतर भविष्य देने की लड़ाई लड़ रहा है।
महिलाओं और लड़कियों पर पाबंदियां: शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्रता का संकट
- शिक्षा पर प्रतिबंध:तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों को छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से रोक दिया गया। महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए। यूनेस्को के अनुसार, अफगानिस्तान में लगभग 24 लाख लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से बाहर हैं। अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों और महिलाओं को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से रोका गया है।
- सार्वजनिक जीवन से बाहर:2022 में पार्क, जिम और सार्वजनिक स्नानागारों जैसी जगहों पर महिलाओं के जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 2024 में तो महिलाओं के सार्वजनिक रूप से तेज आवाज में बोलने तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- रोजगार पर असर:तालिबान के आने से पहले अफगानिस्तान में लगभग हर छह महिलाओं में से एक काम करती थी, जो अब घटकर लगभग हर 20 महिलाओं में एक रह गई है। महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा और रोजगार से बाहर रखने की कीमत अफगानिस्तान को सालाना कम से कम 8 4 करोड़ डॉलर पड़ रही है।
- मानसिक स्वास्थ्य:3,200 से ज्यादा महिलाओं के सर्वेक्षण में आधे से अधिक महिलाओं ने बताया कि वे अब महीने में सिर्फ एक या दो बार ही घर से बाहर निकल पाती हैं। 70 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी मानसिक स्थिति को खराब या बहुत खराब बताया है।
- अंतरराष्ट्रीय फरमान:यूएन वूमेन के अनुसार, तालिबान ने सत्ता में लौटने के बाद महिलाओं के अधिकारों को सीमित करने वाले 100 से ज्यादा फरमान जारी किए हैं।
महिलाओं पर लगे प्रमुख प्रतिबंध
- लड़कियों को छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से रोकना
- महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय बंद करना
- सरकारी नौकरियों से महिलाओं को बाहर करना
- पार्क, जिम और सार्वजनिक स्नानागारों में महिलाओं के जाने पर प्रतिबंध
- महिलाओं के सार्वजनिक रूप से तेज आवाज में बोलने पर प्रतिबंध
- महिलाओं को बिना पुरुष गार्जियन के लंबी दूरी की यात्रा करने से रोकना
- महिलाओं को टेलीविजन, फिल्म और संगीत में दिखाई देने से रोकना
अर्थव्यवस्था: वृद्धि के बावजूद आम आदमी की मुश्किलें बरकरार
- जीडीपी वृद्धि:विश्व बैंक के अनुसार, 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक जीडीपी में लगभग 4 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2026 में भी लगभग 4 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान है।
- मानवीय संकट:2026 में अफगानिस्तान की लगभग 45 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 2 19 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है। इनमें लगभग 1 16 करोड़ बच्चे शामिल हैं।
- अंतरराष्ट्रीय मदद में कमी:अमेरिका ने अक्टूबर 2021 से दिसंबर 2024 के बीच अफगानिस्तान को 3 अरब डॉलर से ज्यादा की मानवीय और विकास सहायता दी थी। मगर जनवरी 2025 में ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान के लिए अमेरिकी मानवीय फंडिंग रोक दी।
- मानवीय अपील:2026 में संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान के लिए 1 7 अरब डॉलर की मानवीय अपील की थी, मगर 14 अगस्त तक इसका सिर्फ 25 प्रतिशत फंड ही मिल पाया था।
- महिला संगठनों का संकट:74 महिला संगठनों के सर्वेक्षण में आधे से ज्यादा संगठनों ने कहा कि वे अगले एक साल में अपना काम बंद कर सकते हैं।
- प्रवासन का दबाव:पाकिस्तान और ईरान से बड़ी संख्या में अफगान नागरिकों की वापसी हुई है। 2023 से अब तक लगभग 60 लाख लोग अफगानिस्तान लौट चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि मई से दिसंबर 2026 के बीच लगभग 27 लाख और लोग अफगानिस्तान लौट सकते हैं।
अर्थव्यवस्था के प्रमुख संकेतक
अंतरराष्ट्रीय संबंध: तालिबान को मिल रही धीमी मान्यता
- अंतरराष्ट्रीय मान्यता:तालिबान को अभी तक व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है, मगर दुनिया का रवैया धीरे-धीरे बदल रहा है।
- देशों का संपर्क:भारत, चीन, ईरान, कतर और मध्य एशिया के देशों ने तालिबान से संपर्क बढ़ाया है।
- रूस की भूमिका:रूस ने पिछले साल तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दी थी और हाल में सैन्य सहयोग समझौता भी किया है।
- यूरोपीय संघ:यूरोपीय संघ ने भी तालिबान अधिकारियों से बातचीत की है।
- अमेरिकी फंडिंग रोक:अमेरिका ने जनवरी 2025 में अफगानिस्तान के लिए मानवीय फंडिंग रोक दी थी, जो अफगानिस्तान को मिलने वाली मानवीय सहायता का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा थी।
- क्षेत्रीय राजनीति:अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद क्षेत्रीय राजनीति में बदलाव आया है। सुरक्षा, प्रवासन, व्यापार, खनिज संसाधन और क्षेत्रीय राजनीति जैसे कारणों से दुनिया तालिबान से संपर्क बढ़ा रही है।
- मानवाधिकार संगठनों की चिंता:मानवाधिकार संगठन चिंता जता रहे हैं कि अगर दुनिया तालिबान से संपर्क बढ़ाती है और महिलाओं के अधिकारों को शर्त नहीं बनाती, तो उस पर सुधार का दबाव कमजोर हो सकता है।
तालिबान के प्रति अंतरराष्ट्रीय रवैया
| देश/संगठन | स्थिति | कारण |
|---|---|---|
| रूस | औपचारिक मान्यता, सैन्य सहयोग | क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, खनिज संसाधन |
| चीन | संपर्क बढ़ा | व्यापार, निवेश, क्षेत्रीय स्थिरता |
| भारत | संपर्क बढ़ा | क्षेत्रीय राजनीति, व्यापार, अफगान प्रवासी |
| ईरान | संपर्क बढ़ा | धार्मिक, सांस्कृतिक संबंध, प्रवासन |
| कतर | मध्यस्थता भूमिका | अंतरराष्ट्रीय संपर्क, राजनीतिक वार्ता |
| यूरोपीय संघ | तालिबान अधिकारियों से बातचीत | मानवीय संकट, प्रवासन, क्षेत्रीय स्थिरता |
| अमेरिका | मानवीय फंडिंग रोक | मानवाधिकार, महिलाओं के अधिकार |
तालिबान का नजरिया: स्थिरता बनाम मानवाधिकार
तालिबान के नजरिए से सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने पांच साल तक सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी है और बड़े पैमाने की लड़ाई पहले की तुलना में कम हुई है। आम लोगों के कुछ हिस्से भी पहले की तुलना में सड़कों पर ज्यादा सुरक्षा महसूस करते हैं। मगर सुरक्षा और स्थिरता एक ही चीज नहीं हैं।
तालिबान का कहना है कि उसने अफगानिस्तान में शांति स्थापित की है और बाहरी हस्तक्षेप से मुक्ति दिलाई है। मगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अफगानिस्तान में मानवाधिकारों, खासकर महिलाओं के अधिकारों पर केंद्रित है।
तालिबान के अधिकारियों का कहना है कि वे अफगानिस्तान की परंपराओं और इस्लामी मूल्यों के अनुसार कानून बना रहे हैं। मगर मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि तालिबान महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों का हनन कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव बढ़ रहा है कि तालिबान महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करे। मगर तालिबान का कहना है कि वे अफगानिस्तान की स्वायत्तता और संप्रभुता का सम्मान करने की मांग करेंगे।
तालिबान के प्रमुख दावे और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
- स्थिरता:तालिबान का कहना है कि उसने अफगानिस्तान में शांति स्थापित की है और बड़े पैमाने की लड़ाई कम हुई है।
- स्वायत्तता:तालिबान का कहना है कि वे अफगानिस्तान की परंपराओं और इस्लामी मूल्यों के अनुसार कानून बना रहे हैं।
- अंतरराष्ट्रीय मान्यता:तालिबान चाहता है कि दुनिया उनकी सरकार को मान्यता दे, मगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय महिलाओं के अधिकारों को लेकर चिंतित है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया:अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव है कि तालिबान महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करे। मगर तालिबान का कहना है कि वे अफगानिस्तान की स्वायत्तता का सम्मान करने की मांग करेंगे।
तुलनात्मक विश्लेषण एवं मुख्य बिंदु
| मापदंड | मुख्य विवरण एवं तथ्य | दूरगामी प्रभाव |
|---|---|---|
| मुख्य विषय | संबद्ध विषय पर विस्तृत समीक्षा एवं आंकड़े | पारदर्शिता में सुधार |
| प्रशासनिक स्थिति | नियमों एवं दिशानिर्देशों के तहत त्वरित कार्रवाई | प्रक्रिया सुदृढ़ एवं प्रभावी |
| सामाजिक प्रभाव | स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता प्रसार | सुरक्षा एवं विश्वास में वृद्धि |
| भविष्य की दिशा | सत्यापित डेटा के आधार पर आगामी योजनाएं | दीर्घकालिक विकास दर में मदद |
क्या तालिबान अफगानिस्तान में स्थिरता ला पाया है
तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर लड़ाई और हमलों में कमी आई है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि अफगानिस्तान पूरी तरह स्थिर हो गया है।
अफगानिस्तान में अभी भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट और महिलाओं पर पाबंदियां हैं। लाखों लोगों को भोजन और स्वास्थ्य सहायता चाहिए। लड़कियां स्कूल नहीं जा सकतीं और महिलाओं की आधी आबादी सार्वजनिक जीवन से बाहर है।
विश्व बैंक भी कहता है कि आर्थिक वृद्धि हो रही है, मगर वह बेहतर जीवन स्तर और ज्यादा आय में नहीं बदल रही। पांच साल बाद अफगानिस्तान की सबसे बड़ी कहानी यही है कि तालिबान सत्ता में टिका रहा मगर देश अभी भी अपने लोगों को बेहतर भविष्य देने की लड़ाई लड़ रहा है।
अफगानिस्तान में तालिबान के पांच साल: आम आदमी की जिंदगी कैसी है
अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद आम आदमी की जिंदगी काफी मुश्किल हो गई है।
- गरीबी:अफगानिस्तान की लगभग 45 प्रतिशत आबादी को मानवीय सहायता की जरूरत है। इसका मतलब है कि लाखों लोग भूखे सो रहे हैं।
- बेरोजगारी:अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है मगर वह आम लोगों की आय बढ़ाने में सक्षम नहीं है।
- स्वास्थ्य संकट:अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सेवाएं बहुत कमजोर हैं। लाखों लोगों को भोजन और स्वास्थ्य सहायता चाहिए।
- महिलाओं पर पाबंदियां:महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन से बाहर रखा जा रहा है। इससे उनके जीवन स्तर पर गहरा असर पड़ा है।
- प्रवासन:पाकिस्तान और ईरान से बड़ी संख्या में अफगान नागरिकों की वापसी हुई है। इससे घर, नौकरी, स्कूल और अस्पतालों पर और दबाव पड़ा है।
तालिबान के पांच साल: अफगानिस्तान का भविष्य क्या है
अफगानिस्तान का भविष्य अनिश्चित है। तालिबान सत्ता में टिका हुआ है मगर देश अभी भी अपने लोगों को बेहतर भविष्य देने की लड़ाई लड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव है कि तालिबान महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करे। मगर तालिबान का कहना है कि वे अफगानिस्तान की परंपराओं और इस्लामी मूल्यों के अनुसार कानून बना रहे हैं।
अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है मगर वह आम लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। लाखों लोगों को भोजन और स्वास्थ्य सहायता चाहिए। लड़कियां स्कूल नहीं जा सकतीं और महिलाओं की आधी आबादी सार्वजनिक जीवन से बाहर है।
अगर अफगानिस्तान को स्थायी शांति और विकास चाहिए, तो उसे महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करना होगा, अंतरराष्ट्रीय मदद बढ़ानी होगी और अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। मगर फिलहाल अफगानिस्तान की स्थिति बहुत मुश्किल बनी हुई है।
तालिबान के पांच साल: अफगानिस्तान के लोगों का क्या कहना है
अफगानिस्तान के लोगों का कहना है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद उनकी जिंदगी काफी मुश्किल हो गई है।
- महिलाओं की स्थिति:महिलाओं का कहना है कि उन्हें शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन से बाहर रखा जा रहा है। इससे उनके जीवन स्तर पर गहरा असर पड़ा है।
- आम आदमी की मुश्किलें:आम आदमी का कहना है कि गरीबी, बेरोजगारी और स्वास्थ्य संकट ने उनकी जिंदगी मुश्किल बना दी है।
- युवाओं का भविष्य:युवाओं का कहना है कि उन्हें शिक्षा और रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे हैं। इससे उनके भविष्य पर असर पड़ रहा है।
- अंतरराष्ट्रीय मदद:लोगों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मदद कम हो गई है। इससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
निष्कर्ष
अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के पांच साल पूरे हो गए हैं। युद्ध कम हुआ मगर संकट बढ़ा है। अफगानिस्तान में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट और महिलाओं पर पाबंदियां बढ़ गई हैं। 2 19 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है।
तालिबान ने अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने का दावा किया है मगर आम लोगों के जीवन स्तर में सुधार नहीं हुआ है। अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है मगर वह आम लोगों की आय बढ़ाने में सक्षम नहीं है। लड़कियां स्कूल नहीं जा सकतीं और महिलाओं की आधी आबादी सार्वजनिक जीवन से बाहर है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव है कि तालिबान महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करे मगर तालिबान का कहना है कि वे अफगानिस्तान की परंपराओं और इस्लामी मूल्यों के अनुसार कानून बना रहे हैं। अफगानिस्तान का भविष्य अनिश्चित है। अगर अफगानिस्तान को स्थायी शांति और विकास चाहिए, तो उसे महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करना होगा, अंतरराष्ट्रीय मदद बढ़ानी होगी और अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। मगर फिलहाल अफगानिस्तान की स्थिति बहुत मुश्किल बनी हुई है।
