वंदे मातरम विवाद: राष्ट्रगीत के प्रति रवैये पर उठे सवाल
भारत में राष्ट्रगीतवंदे मातरम्को लेकर एक बार फिर राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ है। कांग्रेस ने हाल ही में अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के केवल पहले दो पैरों के गायन का फैसला लिया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए इसे देशभक्ति पर सवाल बताया है। इस विवाद ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है।
कांग्रेस का कहना है कि वह अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है, जो उसने वर्ष 1937 में लिया था। उस समय पार्टी ने तय किया था कि वह राष्ट्रगीत के केवल पहले दो पैरों को ही गाएगी। दूसरी ओर, बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के प्रति अपने रवैये से देशभक्ति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने तो यहां तक कहा है कि कांग्रेस अब ‘नई मुस्लिम लीग’ बन गई है, जो राष्ट्रगीत के प्रति अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है।
इस विवाद के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर राष्ट्रगीत के प्रति दोनों राजनीतिक दलों के रवैये में इतना अंतर क्यों है क्या यह सिर्फ राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है या फिर इसके पीछे कोई गहरा अर्थ छिपा है इस लेख में हम इसी विवाद के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।
वंदे मातरम विवाद की शुरुआत: क्या है पूरा मामला
- कांग्रेस का फैसला:कांग्रेस ने हाल ही में अपनी कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में तय किया कि वह अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम के केवल पहले दो पैरों को ही गाएगी। यह फैसला उसने वर्ष 1937 में लिए गए अपने पुराने फैसले का पालन करने के लिए लिया है।
- बीजेपी का विरोध:बीजेपी ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रगीत के प्रति ऐसा रवैया देशभक्ति पर सवाल खड़े करता है। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस के इस फैसले से उसकी देशभक्ति पर शक होता है।
- सरकार का रुख:केंद्र सरकार का कहना है कि देश में सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाया जाना चाहिए। हालांकि, कांग्रेस सरकार के इस सुझाव को उतना महत्व नहीं दे रही है और अपने पुराने फैसले पर कायम है।
- वर्ष 1937 का फैसला:कांग्रेस ने वर्ष 1937 में राष्ट्रगीत के प्रति अपने रवैये को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें उसने तय किया था कि वह केवल पहले दो पैरों को ही गाएगी। अब कांग्रेस उसी फैसले का पालन कर रही है।
कांग्रेस क्यों कर रही है केवल दो पैरों के गायन का फैसला
कांग्रेस के इस फैसले के पीछे का मुख्य कारण उसका वर्ष 1937 में लिया गया प्रस्ताव है। उस समय पार्टी ने तय किया था कि वह राष्ट्रगीत के केवल पहले दो पैरों को ही गाएगी। इस फैसले के पीछे का तर्क यह था कि राष्ट्रगीत के कुछ हिस्सों में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की संभावना थी, जिसके कारण पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में केवल पहले दो पैरों को गाने का फैसला लिया था।
कांग्रेस का कहना है कि वह अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है और अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के केवल पहले दो पैरों को ही गाएगी। पार्टी का यह फैसला उसके इतिहास और मूल्यों का सम्मान करने का एक प्रयास है।
बीजेपी क्यों कर रही है कांग्रेस के फैसले की निंदा
बीजेपी का मानना है कि राष्ट्रगीत के प्रति कांग्रेस का रवैया देशभक्ति पर सवाल खड़े करता है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रगीत देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है और इसे पूरी तरह से गाया जाना चाहिए। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस के इस फैसले से उसकी देशभक्ति पर शक होता है।
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के प्रति अपने पुराने फैसले का पालन करते हुए देश के प्रति अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ लिया है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस अब ‘नई मुस्लिम लीग’ बन गई है, जो राष्ट्रगीत के प्रति अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है।
क्या है राष्ट्रगीत का इतिहास और महत्व
राष्ट्रगीतवंदे मातरम्बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित एक कविता है, जिसे वर्ष 1876 में लिखा गया था। बाद में इसे वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में एक राष्ट्रवादी गीत के रूप में अपनाया गया। वर्ष 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था।
राष्ट्रगीत का पूरा पाठ पांच पैरों में विभाजित है। हालांकि, कांग्रेस केवल पहले दो पैरों को ही गाती है, जिसमें मां भारती की स्तुति की गई है। बाकी तीन पैरों में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की संभावना होने के कारण कांग्रेस ने उन्हें गाने से परहेज किया है।
वंदे मातरम विवाद: दोनों पक्षों के तर्कों की तुलना
वंदे मातरम विवाद: विभिन्न राज्यों में क्या है स्थिति
इस विवाद का असर देश के विभिन्न राज्यों में भी देखा जा रहा है। जहां कुछ राज्य सरकारें राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाने का फैसला ले रही हैं, वहीं कुछ राज्य सरकारें कांग्रेस के रवैये का पालन कर रही हैं।
केरल: मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन का असर
केरल में कांग्रेस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के साथ गठबंधन में सरकार चला रही है। इसी कारण वहां राष्ट्रगीत के गायन को लेकर विवाद उठा है। बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस मुस्लिम लीग के आगे घुटने टेके हुए है और राष्ट्रगीत के प्रति अपने रवैये से देशभक्ति पर सवाल खड़े कर रही है।
केरल के मुख्यमंत्री पद के लिए वीडी सतीशन के नाम की घोषणा पर भी बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। पार्टी ने इसे मुस्लिम लीग के आगे झुकने के रूप में देखा और कहा कि कांग्रेस अब इंडियन नेशनल कांग्रेस नहीं रही, बल्कि मुस्लिम लीग और माओवादी कांग्रेस (एमएमसी) का मेल बन गई है।
गोवा: बीजेपी सरकार का कड़ा रुख
गोवा में बीजेपी सरकार है और वहां राष्ट्रगीत के प्रति सरकार का रुख काफी सख्त है। बीजेपी ने कांग्रेस पर गोवा में भी राष्ट्रगीत का अपमान करने का आरोप लगाया है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि कांग्रेस की मानसिकता वोट बैंक की राजनीति से ग्रस्त है और वह राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान नहीं करती।
दिल्ली: केंद्र सरकार का रुख
दिल्ली में केंद्र सरकार का शासन है और वहां राष्ट्रगीत के प्रति सरकार का रुख काफी सख्त है। केंद्र सरकार का कहना है कि देश में सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाया जाना चाहिए। हालांकि, कांग्रेस सरकार के इस सुझाव को उतना महत्व नहीं दे रही है और अपने पुराने फैसले पर कायम है।
कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश: अलग स्थिति
कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकारें हैं, लेकिन वहां राष्ट्रगीत के प्रति सरकारों का रुख अलग है। इन राज्यों में राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाया जाता है, जबकि कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में केवल पहले दो पैरों को गाती है।
वंदे मातरम विवाद पर उठे प्रमुख सवाल
| विषय | कांग्रेस का पक्ष | बीजेपी का पक्ष |
|---|---|---|
| राष्ट्रगीत के प्रति रवैया | कांग्रेस केवल पहले दो पैरों को गाने का फैसला लिया है, जो वर्ष 1937 के प्रस्ताव का पालन है। | बीजेपी का कहना है कि राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाया जाना चाहिए, क्योंकि यह देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है। |
| देशभक्ति पर सवाल | कांग्रेस का कहना है कि वह अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है और देशभक्ति के प्रति प्रतिबद्ध है। | बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस के इस फैसले से उसकी देशभक्ति पर शक होता है। |
| वर्ष 1937 का प्रस्ताव | कांग्रेस का कहना है कि वह वर्ष 1937 के अपने प्रस्ताव का पालन कर रही है, जिसमें उसने राष्ट्रगीत के केवल पहले दो पैरों को गाने का फैसला लिया था। | बीजेपी का कहना है कि वर्ष 1937 का प्रस्ताव ब्रिटिश शासन के दौरान लिया गया था और आज के समय में इसका कोई महत्व नहीं रह गया है। |
| ‘नई मुस्लिम लीग’ का आरोप | कांग्रेस ने बीजेपी के इस आरोप को खारिज किया है और कहा है कि वह देश की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध है। | बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस मुस्लिम लीग के प्रति अपने पुराने रवैये का पालन कर रही है, जो राष्ट्रगीत के प्रति उसके रवैये से स्पष्ट होता है। |
| सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत | कांग्रेस का कहना है कि वह अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के केवल पहले दो पैरों को गाएगी, जबकि सरकारी कार्यक्रमों में इसे पूरा गाया जाना चाहिए। | बीजेपी का कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाया जाना चाहिए, क्योंकि यह देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है। |
1 क्या राष्ट्रगीत के केवल दो पैरों को गाने से देशभक्ति पर सवाल खड़े होते हैं
इस सवाल पर दोनों राजनीतिक दलों के विचार अलग-अलग हैं। कांग्रेस का कहना है कि वह अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है और देशभक्ति के प्रति प्रतिबद्ध है। दूसरी ओर, बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस के इस फैसले से उसकी देशभक्ति पर शक होता है।
2 क्या वर्ष 1937 का प्रस्ताव आज के समय में प्रासंगिक है
वर्ष 1937 में लिया गया प्रस्ताव ब्रिटिश शासन के दौरान लिया गया था। बीजेपी का कहना है कि आज के समय में इस प्रस्ताव का कोई महत्व नहीं रह गया है और राष्ट्रगीत के प्रति कांग्रेस का रवैया देश की एकता और अखंडता के खिलाफ है। दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि वह अपने इतिहास और मूल्यों का सम्मान कर रही है।
3 क्या कांग्रेस मुस्लिम लीग के प्रति अपने पुराने रवैये का पालन कर रही है
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस मुस्लिम लीग के प्रति अपने पुराने रवैये का पालन कर रही है, जो राष्ट्रगीत के प्रति उसके रवैये से स्पष्ट होता है। कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज किया है और कहा है कि वह देश की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध है।
4 क्या राष्ट्रगीत के प्रति कांग्रेस का रवैया वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस का राष्ट्रगीत के प्रति रवैया वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस मुस्लिम समुदाय के वोटों को ध्यान में रखते हुए ऐसा कर रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज किया है और कहा है कि वह अपने इतिहास और मूल्यों का सम्मान कर रही है।
5 क्या राष्ट्रगीत के प्रति सरकारों का रुख राज्यों में अलग-अलग होना चाहिए
इस सवाल पर भी दोनों राजनीतिक दलों के विचार अलग-अलग हैं। बीजेपी का कहना है कि राष्ट्रगीत के प्रति सरकारों का रुख एक समान होना चाहिए, क्योंकि यह देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है। दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि राज्य सरकारें अपने-अपने तरीके से राष्ट्रगीत के प्रति रवैया अपना सकती हैं।
निष्कर्ष
वंदे मातरम विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। कांग्रेस और बीजेपी के बीच राष्ट्रगीत के प्रति रवैये को लेकर उठे इस विवाद ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी गूंज पैदा कर दी है। जहां कांग्रेस अपने पुराने फैसले का पालन कर रही है, वहीं बीजेपी इसे देशभक्ति पर सवाल मान रही है।
इस विवाद के बीच यह स्पष्ट है कि राष्ट्रगीत के प्रति दोनों राजनीतिक दलों के रवैये में काफी अंतर है। कांग्रेस का कहना है कि वह अपने इतिहास और मूल्यों का सम्मान कर रही है, जबकि बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति कर रही है।
इस विवाद का असर देश के विभिन्न राज्यों में भी देखा जा रहा है। जहां कुछ राज्य सरकारें राष्ट्रगीत के सभी पांच पैरों को गाने का फैसला ले रही हैं, वहीं कुछ राज्य सरकारें कांग्रेस के रवैये का पालन कर रही हैं।
अंततः यह विवाद देश की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता का एक प्रतीक बन गया है। राष्ट्रगीत देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है, और इसे लेकर उठे इस विवाद ने एक बार फिर देश के सामने इस बात को रेखांकित कर दिया है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और प्रतिबद्धता कितनी महत्वपूर्ण है।
