पाकिस्तान में न्यायपालिका नियुक्तियों पर राष्ट्रपति जरदारी और सरकार के बीच गंभीर टकराव
पाकिस्तान में न्यायपालिका नियुक्तियों को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और संघीय सरकार के बीच गंभीर टकराव उत्पन्न हो गया है।जुलाई 2026 में ज्यूडिशियल कमीशन ऑफ पाकिस्तान ने हाई कोर्ट में 19 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति की सिफारिश की थी, साथ ही पेशावर हाई कोर्ट के चार और लाहौर हाई कोर्ट के एक अतिरिक्त जज की सेवा पक्की करने तथा सिंध हाई कोर्ट के एक जज का कार्यकाल बढ़ाने का फैसला लिया था। हालांकि, राष्ट्रपति जरदारी ने अब तक इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है, जिसके कारण कानून मंत्रालय ने नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार,संविधान के अनुच्छेद 48(1) के तहत राष्ट्रपति को प्रस्ताव मिलने के दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी। चूंकि समय सीमा बीत चुकी है, इसलिए सरकार खुद नोटिफिकेशन जारी कर सकती है। वहीं राष्ट्रपति कार्यालय के सूत्रों ने चेतावनी दी है कि इस प्रक्रिया को दरकिनार करने से राजनीतिक और कानूनी संकट उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा है कि इस मुद्दे को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच बातचीत से सुलझाना चाहिए।
इस देरी का असर पहले ही दिखने लगा है।पेशावर हाई कोर्ट के चार अतिरिक्त जज 4 अगस्त 2026 को अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद पद छोड़ चुके हैं, जबकि सिंध हाई कोर्ट के जज भी 29 जुलाई 2026 को पदमुक्त हो गए थे। इस्लामाबाद हाई कोर्ट में इस देरी के खिलाफ याचिका भी दायर की गई है, जिस पर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।
कानून मंत्री अकील मलिक ने कहा है कि सरकार इस मामले को संवैधानिक दायरे में ही सुलझाएगी। वहीं वकील लुकमान जफर चौधरी ने अपने वकील जाहिद आसिफ चौधरी के जरिए एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें कोर्ट से राष्ट्रपति को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे द्वारा अनुशंसित न्यायिक नियुक्तियों के लिए प्रधानमंत्री द्वारा भेजी गई समरी को मंजूरी दें।
जस्टिस अरबाब मुहम्मद ताहिर ने गुरुवार को इस याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ने 20 और 21 जुलाई 2026 को हुई अपनी बैठकों में इन नियुक्तियों की सिफारिश की थी। उन्होंने कहा कि 15 दिन बीत जाने के बाद भी राष्ट्रपति ने इस समरी को मंजूरी नहीं दी है।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि खबरों के अनुसार सरकार अगले 48 घंटों में नियुक्तियों के लिए नोटिफिकेशन जारी कर सकती है। इस पूरे मामले ने पाकिस्तान में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी है।
न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच विवाद की मुख्य वजहें
- संवैधानिक प्रावधानों का पालन न होना:संविधान के अनुच्छेद 48(1) के अनुसार राष्ट्रपति को प्रस्ताव मिलने के दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन राष्ट्रपति जरदारी ने अब तक ऐसा नहीं किया है।
- की सिफारिशों पर राष्ट्रपति की मंजूरी का अभाव:द्वारा 19 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति, पेशावर हाई कोर्ट के चार और लाहौर हाई कोर्ट के एक अतिरिक्त जज की सेवा पक्की करने तथा सिंध हाई कोर्ट के एक जज का कार्यकाल बढ़ाने की सिफारिश की गई थी, जिसे राष्ट्रपति ने मंजूरी नहीं दी है।
- सरकार द्वारा स्वतंत्र निर्णय लेने की कोशिश:सरकार राष्ट्रपति की सहमति के बिना ही न्यायिक नियुक्तियों के नोटिफिकेशन जारी करने पर विचार कर रही है, जिससे राजनीतिक और कानूनी संकट उत्पन्न होने की आशंका है।
- न्यायपालिका में रिक्तियों का बढ़ता संकट:पेशावर हाई कोर्ट के चार अतिरिक्त जज और सिंध हाई कोर्ट के एक जज के पदमुक्त होने के बाद न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
- न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल:इस मामले ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका के हस्तक्षेप को लेकर बहस छेड़ दी है।
न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच टकराव के प्रमुख पहलू
- की भूमिका:द्वारा न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश की जाती है, जिसे राष्ट्रपति और सरकार दोनों को मानना होता है।
- राष्ट्रपति की भूमिका:राष्ट्रपति को की सिफारिशों पर मंजूरी देनी होती है, लेकिन राष्ट्रपति जरदारी ने ऐसा नहीं किया है।
- सरकार की भूमिका:सरकार की सिफारिशों को लागू करने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रही है, लेकिन देरी के कारण वह खुद नोटिफिकेशन जारी करने पर विचार कर रही है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता:न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए सरकार और राष्ट्रपति दोनों को मिलकर काम करना चाहिए, लेकिन इस मामले में दोनों के बीच टकराव उत्पन्न हो गया है।
- संवैधानिक संकट:इस मामले ने संवैधानिक संकट उत्पन्न कर दिया है, जिससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन प्रभावित हो रहा है।
न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच टकराव के प्रभाव
- न्यायपालिका में रिक्तियों का बढ़ना:पेशावर हाई कोर्ट के चार अतिरिक्त जज और सिंध हाई कोर्ट के एक जज के पदमुक्त होने के बाद न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
- न्यायिक प्रक्रिया में देरी:राष्ट्रपति की मंजूरी के अभाव में न्यायिक नियुक्तियों में देरी हो रही है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
- राजनीतिक संकट:इस मामले ने राजनीतिक संकट उत्पन्न कर दिया है, जिससे सरकार और राष्ट्रपति के बीच संबंध प्रभावित हो रहे हैं।
- कानूनी संकट:इस मामले ने कानूनी संकट उत्पन्न कर दिया है, जिससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन प्रभावित हो रहा है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल:इस मामले ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए हैं, जिससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।
न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच टकराव: तुलनात्मक विश्लेषण
न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच टकराव: प्रमुख सवाल और जवाब
| पक्ष | स्थिति | तर्क | प्रभाव |
|---|---|---|---|
| राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी | की सिफारिशों को मंजूरी नहीं दी | संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को प्रस्ताव मिलने के दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया | न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं, न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है |
| सरकार (कानून मंत्रालय) | नोटिफिकेशन जारी करने पर विचार कर रही है | राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना भी सरकार नोटिफिकेशन जारी कर सकती है | राजनीतिक और कानूनी संकट उत्पन्न होने की आशंका |
| (ज्यूडिशियल कमीशन ऑफ पाकिस्तान) | न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश की | द्वारा न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश की गई थी, जिसे राष्ट्रपति ने मंजूरी नहीं दी | न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं, न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है |
| न्यायपालिका | न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है | न्यायिक नियुक्तियों में देरी के कारण न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है | न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं |
| नागरिक समाज | मामले पर नजर रख रहा है | नागरिक समाज इस मामले पर नजर रख रहा है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठा रहा है | न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है |
1. न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच टकराव क्यों उत्पन्न हुआ है?
न्यायिक नियुक्तियों में राष्ट्रपति और सरकार के बीच टकराव उत्पन्न होने का मुख्य कारण राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा की सिफारिशों को मंजूरी नहीं देना है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को प्रस्ताव मिलने के दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके कारण सरकार राष्ट्रपति की सहमति के बिना ही न्यायिक नियुक्तियों के नोटिफिकेशन जारी करने पर विचार कर रही है।
2. क्या है और इसकी भूमिका क्या है?
का पूरा नाम ज्यूडिशियल कमीशन ऑफ पाकिस्तान है। यह पाकिस्तान में न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश करने वाला सर्वोच्च निकाय है। द्वारा न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश की जाती है, जिसे राष्ट्रपति और सरकार दोनों को मानना होता है।
3. सरकार राष्ट्रपति की सहमति के बिना न्यायिक नियुक्तियों के नोटिफिकेशन क्यों जारी करना चाह रही है?
सरकार राष्ट्रपति की सहमति के बिना न्यायिक नियुक्तियों के नोटिफिकेशन जारी करने पर विचार कर रही है क्योंकि राष्ट्रपति जरदारी द्वारा की सिफारिशों को मंजूरी नहीं दी गई है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को प्रस्ताव मिलने के दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके कारण न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
4. इस मामले का न्यायपालिका पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इस मामले का न्यायपालिका पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसके अलावा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं, जिससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।
5. क्या इस मामले से राजनीतिक संकट उत्पन्न हो सकता है?
हां, इस मामले से राजनीतिक संकट उत्पन्न हो सकता है। सरकार और राष्ट्रपति के बीच टकराव उत्पन्न हो गया है, जिससे दोनों के बीच संबंध प्रभावित हो रहे हैं। इसके अलावा, इस मामले ने कानूनी संकट उत्पन्न कर दिया है, जिससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन प्रभावित हो रहा है।
निष्कर्ष
पाकिस्तान में न्यायिक नियुक्तियों को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और संघीय सरकार के बीच उत्पन्न हुआ टकराव एक गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक संकट का संकेत है।द्वारा 19 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति, पेशावर हाई कोर्ट के चार और लाहौर हाई कोर्ट के एक अतिरिक्त जज की सेवा पक्की करने तथा सिंध हाई कोर्ट के एक जज का कार्यकाल बढ़ाने की सिफारिश की गई थी, जिसे राष्ट्रपति जरदारी ने मंजूरी नहीं दी है।
इस देरी के कारण न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ गई हैं और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। सरकार राष्ट्रपति की सहमति के बिना ही न्यायिक नियुक्तियों के नोटिफिकेशन जारी करने पर विचार कर रही है, जिससे राजनीतिक और कानूनी संकट उत्पन्न होने की आशंका है।
इस मामले ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका के हस्तक्षेप को लेकर बहस छेड़ दी है।न्यायपालिका में रिक्तियां बढ़ने और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने के कारण न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
ऐसे में आवश्यक है कि राष्ट्रपति और सरकार दोनों मिलकर इस मामले को संवैधानिक दायरे में ही सुलझाएं, ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता बनी रहे।
