भारत की राजधानी दिल्ली ने 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की, जो वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और ब्रिक्स समूह के भीतर सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत मंडपम में आयोजित इस दो दिवसीय मेगा समिट का आधिकारिक आगाज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने वैश्विक शासन सुधारों के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप प्रस्तुत किया। इस सम्मेलन में ब्रिक्स सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधियों के साथ-साथ दुनिया भर के लगभग 20 अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया, जिससे इसकी वैश्विक प्रासंगिकता और व्यापकता स्पष्ट होती है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने उद्घाटन भाषण में ब्रिक्स समूह के पिछले 20 वर्षों की उपलब्धियों का जिक्र किया और अगले 20 वर्षों के लिए एक नए और महत्वाकांक्षी एजेंडे पर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के देशों की स्थिति पर प्रकाश डाला, यह कहते हुए कि वे आज वैश्विक संकटों की फ्रंट रॉ में हैं, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में बैक रो में हैं। इस स्थिति को बदलने और वैश्विक निर्णय प्रक्रियाओं में अधिक समावेशिता लाने के लिए उन्होंने ब्रिक्स देशों से मिलकर काम करने का आह्वान किया। सम्मेलन के दौरान, भारत द्वारा रखे गए सभी प्रस्तावों को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं की, और इसे न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन का नाम दिया गया। यह घोषणा ब्रिक्स समूह के भीतर भारत के नेतृत्व और उसके दृष्टिकोण की स्वीकार्यता को दर्शाती है, विशेष रूप से वैश्विक शासन संरचनाओं में सुधार लाने के प्रयासों के संबंध में। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की लगभग सात वर्षों बाद भारत यात्रा भी इस सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पहलू रही, जो गलवान संघर्ष के बाद उनकी पहली भारत यात्रा थी। उनकी उपस्थिति ने ब्रिक्स मंच की महत्ता को और बढ़ा दिया, जहां सदस्य देश महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर चर्चा और सहयोग के लिए एक साथ आते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का ब्रिक्स सुधारों पर महत्वाकांक्षी रोडमैप
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स समूह के भीतर और व्यापक वैश्विक शासन संरचनाओं में सुधारों के लिए एक दूरदर्शी रोडमैप प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स को केवल एक आर्थिक मंच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और एक अधिक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा, जिसमें उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों को मिलकर ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म के लिए 10 प्रस्ताव तैयार करने चाहिए। इन प्रस्तावों को अगली ब्रिक्स समिट तक एक ठोस ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप का रूप दिया जा सकता है। यह रोडमैप ब्रिक्स के आंतरिक कार्य प्रणालियों से शुरू होकर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधारों तक विस्तृत होगा।
- 10 प्रस्तावों का आह्वान:प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स देशों से वैश्विक शासन सुधारों के लिए 10 विशिष्ट प्रस्तावों का मसौदा तैयार करने का आग्रह किया, जो अगली शिखर सम्मेलन तक एक व्यापक रोडमैप का आधार बनेंगे।
- आंतरिक कार्य प्रणालियों से शुरुआत:उन्होंने सुझाव दिया कि सुधार की प्रक्रिया ब्रिक्स की अपनी आंतरिक कार्य प्रणालियों से शुरू होनी चाहिए, जिससे समूह की दक्षता और प्रभावशीलता बढ़ाई जा सके।
- अगले 20 वर्षों के लिए एजेंडा:प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स के लिए अगले 20 वर्षों के लिए एक नए और महत्वाकांक्षी एजेंडे पर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें सतत विकास, समावेशी विकास और वैश्विक शांति जैसे मुद्दे शामिल हों।
- वैश्विक चुनौतियों का समाधान:रोडमैप का उद्देश्य केवल ब्रिक्स के भीतर सुधार करना नहीं, बल्कि समूह को वैश्विक संकटों और चुनौतियों का सामना करने के लिए एक अधिक मजबूत और प्रतिक्रियाशील इकाई बनाना भी है।
ग्लोबल साउथ की आवाज और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में ग्लोबल साउथ के देशों की वर्तमान स्थिति पर विशेष ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने एक मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्लोबल साउथ आज वैश्विक संकटों की फ्रंट रॉ में है, यानी वे जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और महामारी जैसे संकटों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। हालांकि, इसके बावजूद, वे वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में बैक रो में हैं, जिसका अर्थ है कि उनकी आवाज और प्रतिनिधित्व अक्सर महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर कम होता है। यह टिप्पणी वैश्विक शासन संरचनाओं में व्याप्त असमानता और विकासशील देशों के हाशिए पर धकेले जाने की स्थिति को उजागर करती है।
- संकटों की फ्रंट रॉ :ग्लोबल साउथ के देश अक्सर वैश्विक संकटों, जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, आर्थिक झटके और स्वास्थ्य आपात स्थितियों का सबसे पहले और सबसे गंभीर रूप से सामना करते हैं।
- निर्णय लेने की बैक रो :इन देशों को वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं, जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, जिससे उनकी चिंताओं और आवश्यकताओं को अक्सर अनदेखा किया जाता है।
- समावेशी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता:प्रधानमंत्री मोदी ने इस असमानता को दूर करने और ग्लोबल साउथ को वैश्विक निर्णय प्रक्रियाओं में अधिक प्रभावी भूमिका देने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि एक अधिक न्यायसंगत और संतुलित विश्व व्यवस्था का निर्माण हो सके।
- ब्रिक्स की भूमिका:ब्रिक्स समूह को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में कार्य करने और उनके हितों को वैश्विक मंचों पर उठाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है।
प्रमुख प्रस्ताव और न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन की स्वीकृति
दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, भारत ने कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव प्रस्तुत किए, जिनका उद्देश्य ब्रिक्स समूह को मजबूत करना और वैश्विक शासन में सुधार लाना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में तीन बड़े प्रस्तावों पर विशेष जोर दिया, जिनमें समुद्री सुरक्षा, ग्लोबल साउथ के हितों का प्रतिनिधित्व और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार शामिल थे। ये प्रस्ताव वैश्विक शांति, स्थिरता और समावेशी विकास के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। सम्मेलन के समापन पर, प्रधानमंत्री मोदी ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जिसमें उन्होंने बताया कि भारत द्वारा रखे गए सभी प्रस्तावों को ब्रिक्स सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया है। इस सर्वसम्मत स्वीकृति को न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन का नाम दिया गया, जो ब्रिक्स समूह के भीतर एक मजबूत सहमति और सहयोग का प्रतीक है।
- समुद्री सुरक्षा:भारत ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा और समुद्री डकैती तथा अवैध गतिविधियों से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव रखा।
- ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व:ग्लोबल साउथ के देशों की आवाज को वैश्विक मंचों पर मजबूत करने और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अधिक प्रतिनिधित्व देने पर जोर दिया गया।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार:संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि यह वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सके और अधिक समावेशी बन सके।
- लोकल करेंसी में व्यापार:ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई, जिसका उद्देश्य डॉलर पर निर्भरता कम करना और सदस्य देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करना है।
- न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन :भारत के सभी प्रस्तावों की सर्वसम्मति से स्वीकृति को न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन के रूप में जाना गया, जो ब्रिक्स के भविष्य के एजेंडे के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा और द्विपक्षीय महत्व
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि यह लगभग सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा थी। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब भारत और चीन के बीच गलवान संघर्ष के बाद द्विपक्षीय संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। शी जिनपिंग शनिवार को नई दिल्ली पहुंचे, जहां उन्होंने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लिया। उनकी उपस्थिति ने ब्रिक्स मंच की महत्ता को और बढ़ा दिया, जो सदस्य देशों को महत्वपूर्ण वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करता है, भले ही उनके द्विपक्षीय संबंध कैसे भी हों।
- सात वर्षों बाद आगमन:चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग लगभग सात वर्षों के अंतराल के बाद भारत आए, जो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के महत्व को दर्शाता है।
- गलवान संघर्ष के बाद पहली यात्रा:यह गलवान संघर्ष के बाद उनकी पहली भारत यात्रा थी, जिसने इस यात्रा को और अधिक कूटनीतिक महत्व दिया।
- ब्रिक्स मंच की भूमिका:उनकी उपस्थिति ने ब्रिक्स को एक ऐसे मंच के रूप में स्थापित किया जहां सदस्य देश, भले ही उनके द्विपक्षीय मतभेद हों, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए एक साथ आ सकते हैं।
- प्रधानमंत्री मोदी से संभावित मुलाकात:हालांकि विशिष्ट परिणामों का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच अहम बैठक होने की संभावना थी, जो दोनों देशों के बीच संवाद के अवसर प्रदान करती है।
ब्रिक्स की 20 वर्षों की उपलब्धियां और भविष्य की दिशा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान ब्रिक्स समूह की पिछले 20 वर्षों की यात्रा और उसकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स ने इन दो दशकों में खुद को एक महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है, जो विकासशील देशों की आवाज को बुलंद करता है। ब्रिक्स ने न केवल सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा दिया है, बल्कि वैश्विक शासन संरचनाओं में सुधारों की वकालत भी की है। प्रधानमंत्री ने समूह के लिए एक महत्वाकांक्षी भविष्य की परिकल्पना की, जिसमें अगले 20 वर्षों के लिए एक नया और व्यापक एजेंडा शामिल है। इस एजेंडे में सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना, डिजिटल परिवर्तन को बढ़ावा देना, जलवायु परिवर्तन से निपटना और एक अधिक समावेशी और न्यायसंगत विश्व व्यवस्था का निर्माण करना शामिल है।
- दो दशकों की उपलब्धियां:ब्रिक्स ने पिछले 20 वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की है, सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया है।
- विकासशील देशों की आवाज:ब्रिक्स ने ग्लोबल साउथ के देशों के हितों का प्रतिनिधित्व करने और वैश्विक मंचों पर उनकी चिंताओं को उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- भविष्य का महत्वाकांक्षी एजेंडा:प्रधानमंत्री मोदी ने अगले 20 वर्षों के लिए एक नए और महत्वाकांक्षी एजेंडे का आह्वान किया, जिसमें ब्रिक्स को वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।
- आंतरिक कार्य प्रणालियों में सुधार:भविष्य की दिशा में ब्रिक्स की आंतरिक कार्य प्रणालियों में सुधार और अधिक दक्षता लाने पर भी जोर दिया गया, ताकि समूह अपनी क्षमता का पूरी तरह से उपयोग कर सके।
| पहलु | विवरण |
|---|---|
| अध्यक्षता | भारत |
| स्थान | भारत मंडपम, नई दिल्ली |
| अवधि | दो दिवसीय (12 और 13 सितंबर) |
| प्रधानमंत्री मोदी के मुख्य प्रस्ताव | वैश्विक शासन सुधारों के लिए 10 प्रस्ताव, समुद्री सुरक्षा, ग्लोबल साउथ, यूएनएससी में सुधार |
| न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन | भारत के सभी प्रस्तावों की सर्वसम्मति से स्वीकृति |
| चीनी राष्ट्रपति की उपस्थिति | शी जिनपिंग, लगभग 7 वर्षों बाद भारत आगमन |
| अन्य प्रमुख नेता | पुतिन, पेजेशकियान |
| विस्तारित भागीदारी | ब्रिक्स सदस्य देशों के साथ 20 अन्य देश |
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य क्या था
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वैश्विक शासन संरचनाओं में सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना, ब्रिक्स समूह को मजबूत करना, ग्लोबल साउथ के देशों की चिंताओं को उठाना और सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष रूप से वैश्विक निर्णय प्रक्रियाओं में अधिक समावेशिता लाने और ब्रिक्स को अगले 20 वर्षों के लिए एक महत्वाकांक्षी एजेंडा प्रदान करने पर जोर दिया। इसका लक्ष्य एक अधिक न्यायसंगत और संतुलित विश्व व्यवस्था का निर्माण करना था, जहां विकासशील देशों की आवाज को पर्याप्त महत्व मिले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक शासन सुधारों के लिए क्या प्रस्ताव रखे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक शासन सुधारों के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने ब्रिक्स देशों से मिलकर 10 प्रस्ताव तैयार करने का आह्वान किया। इन प्रस्तावों का उद्देश्य ब्रिक्स की आंतरिक कार्य प्रणालियों में सुधार करना और व्यापक वैश्विक संस्थानों, जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, में सुधार लाना था। उन्होंने समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने, ग्लोबल साउथ के हितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने और यूएनएससी में सुधारों की आवश्यकता पर भी विशेष जोर दिया। इन प्रस्तावों का लक्ष्य वैश्विक चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना करना और विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रियाओं में उचित स्थान दिलाना था।
न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन क्या है और इसका क्या महत्व है
न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत द्वारा प्रस्तुत सभी प्रस्तावों की ब्रिक्स सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मत स्वीकृति को संदर्भित करता है। इस घोषणा का महत्व यह है कि यह ब्रिक्स समूह के भीतर एक मजबूत सहमति और सहयोग को दर्शाता है, विशेष रूप से वैश्विक शासन सुधारों और ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर। यह घोषणा ब्रिक्स के भविष्य के एजेंडे के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और समूह की एकजुटता तथा वैश्विक प्रभाव को मजबूत करती है।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा का क्या महत्व था
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा का अत्यधिक महत्व था क्योंकि यह लगभग सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा थी, विशेष रूप से गलवान संघर्ष के बाद। उनकी उपस्थिति ने ब्रिक्स मंच की महत्ता को रेखांकित किया, जो सदस्य देशों को, भले ही उनके द्विपक्षीय संबंध तनावपूर्ण हों, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए एक साथ आने का अवसर प्रदान करता है। यह यात्रा दोनों देशों के बीच संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर भी प्रदान करती है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा मिल सकता है।
ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के लिए क्या चर्चा हुई
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण चर्चाएं हुईं। इनमें से एक प्रमुख बिंदु स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना था। इसका उद्देश्य अमेरिकी डॉलर जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राओं पर निर्भरता को कम करना और ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करना है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार से सदस्य देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी झटकों से बचाने और व्यापारिक लेनदेन को अधिक कुशल बनाने में मदद मिल सकती है, जिससे समूह के भीतर आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
निष्कर्ष
दिल्ली में संपन्न हुआ 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक क्षमता और ब्रिक्स समूह के भीतर सुधारों की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तुत वैश्विक शासन सुधारों का महत्वाकांक्षी रोडमैप और ग्लोबल साउथ की आवाज को बुलंद करने का आह्वान, समूह के भविष्य के लिए एक नई दिशा निर्धारित करता है। न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन के माध्यम से भारत के सभी प्रस्तावों की सर्वसम्मत स्वीकृति, ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच गहरे सहयोग और साझा दृष्टिकोण का प्रमाण है। यह घोषणा न केवल ब्रिक्स के आंतरिक कार्य प्रणालियों में सुधारों का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे वैश्विक संस्थानों में अधिक समावेशिता और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की लगभग सात वर्षों बाद भारत यात्रा ने इस सम्मेलन के कूटनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया, यह दर्शाते हुए कि ब्रिक्स एक ऐसा मंच है जहां सदस्य देश, अपने द्विपक्षीय मतभेदों के बावजूद, महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर संवाद और सहयोग के लिए एक साथ आ सकते हैं। समुद्री सुरक्षा, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और ग्लोबल साउथ के सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर हुई चर्चाएं ब्रिक्स की बहुआयामी भूमिका को उजागर करती हैं। कुल मिलाकर, यह शिखर सम्मेलन ब्रिक्स को एक अधिक प्रभावी, प्रतिक्रियाशील और समावेशी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो अगले दो दशकों के लिए एक महत्वाकांक्षी एजेंडा निर्धारित करता है और एक अधिक न्यायसंगत तथा संतुलित विश्व व्यवस्था के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।
