उत्तर प्रदेश में विशेष शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसने लगभग 4900 पदों पर होने वाली विशेष चयन प्रक्रिया में पूर्व संविदा शिक्षकों को बड़ा झटका दिया है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की पीठ ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा जारी विज्ञापन की उस शर्त को पूरी तरह से वैध, तर्कसंगत और संवैधानिक ठहराया है, जिसके तहत केवल वर्तमान में संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग के माध्यम से कार्यरत विशेष शिक्षकों को ही स्क्रीनिंग और चयन प्रक्रिया में शामिल होने की पात्रता दी गई है। इस फैसले के साथ ही, वर्ष 2019 से सेवा से बाहर चल रहे पूर्व संविदा शिक्षकों द्वारा दायर याचिका को भी खारिज कर दिया गया है, जिससे उनकी नियमित नियुक्ति की उम्मीदों को गहरा आघात लगा है।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि वे वर्षों से समेकित शिक्षा योजना के तहत इटिनरेंट/रिसोर्स टीचर (विशेष शिक्षक) के रूप में कार्यरत थे और उनके पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यताएं तथा भारतीय पुनर्वास परिषद का वैध पंजीकरण भी है। उनका तर्क था कि केवल वर्तमान में बेरोजगार होने के आधार पर उन्हें भर्ती प्रक्रिया से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह चयन प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्देशों के तहत हो रही है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि लगभग 4900 रिक्त पदों के लिए विज्ञापन निकालकर उन शिक्षकों के आवेदनों पर विचार किया जाए जो संविदा या आउटसोर्सिंग पर काम कर रहे हैं। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि वह सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के तहत तय की गई पात्रता शर्त को अपनी ओर से शिथिल नहीं कर सकता। यह निर्णय दिव्यांग बच्चों को निरंतर दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कार्यरत संविदा शिक्षकों का एक विशिष्ट वर्ग बनाकर पहले उनकी स्क्रीनिंग करने की तार्किकता को भी रेखांकित करता है। इस फैसले का दूरगामी प्रभाव उत्तर प्रदेश में विशेष शिक्षकों की भर्ती नीति और संविदा कर्मचारियों के भविष्य पर पड़ सकता है।
उच्च न्यायालय का निर्णय और मुख्य तर्क
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विशेष शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित पात्रता शर्त को बरकरार रखते हुए एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल कायम की है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि विज्ञापन में केवल वर्तमान में संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग पर कार्यरत विशेष शिक्षकों को ही स्क्रीनिंग और चयन में शामिल करने की शर्त पूर्णतः वैध, तर्कसंगत और संवैधानिक है। न्यायालय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि यह शर्त सर्वोच्च न्यायालय के रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के अनुरूप है, और उच्च न्यायालय के पास इन निर्देशों को शिथिल करने का कोई अधिकार नहीं है।
न्यायालय ने डॉ एम वी नायर केस का हवाला देते हुए कहा कि पात्रता चयन प्रक्रिया में प्रवेश की दहलीज होती है, जबकि पिछला अनुभव या उपयुक्तता केवल पात्रता पूरी होने के बाद देखी जाती है। इसका अर्थ है कि भले ही याचिकाकर्ताओं के पास पूर्व अनुभव और आवश्यक योग्यताएं थीं, लेकिन वर्तमान में कार्यरत होने की अनिवार्य शर्त को पूरा न कर पाने के कारण वे पात्रता की दहलीज पार नहीं कर सके। न्यायालय ने यह भी कहा कि भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) पंजीकरण होना एक शर्त पूरी करता है, लेकिन यह वर्तमान में कार्यरत होने की अनिवार्य शर्त का विकल्प नहीं बन सकता।
न्यायालय ने अनवर अली सरकार और राम कृष्ण डालमिया केस का उल्लेख करते हुए यह भी तर्क दिया कि कार्यरत संविदा शिक्षकों का एक विशिष्ट वर्ग बनाकर पहले उनकी स्क्रीनिंग करना पूरी तरह तार्किक है। इस विशिष्ट वर्गीकरण का सीधा संबंध दिव्यांग बच्चों को निरंतर दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से है, जो कि सार्वजनिक हित में एक महत्वपूर्ण विचार है। न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश के आधार पर परीक्षा देने से अंतिम रूप से कोई कानूनी या स्थायी अधिकार पैदा न होने की बात को एस कृष्णा चैतन्य और अभिमन्यु राम केस का हवाला देते हुए दोहराया। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने प्रत्यावेदन को दया याचिका बताना यह दर्शाता है कि वे अधिकार नहीं बल्कि रियायत मांग रहे थे।
- पात्रता शर्त की वैधता:न्यायालय ने विज्ञापन की शर्त संख्या 2 को वैध, तर्कसंगत और संवैधानिक माना, जिसमें केवल वर्तमान में कार्यरत संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग विशेष शिक्षकों को ही पात्र माना गया है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन:यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के तहत लिया गया है।
- न्यायिक समीक्षा की सीमाएं:उच्च न्यायालय वर्तमान में कार्यरत शब्द को अतीत में काम कर चुके में नहीं बदल सकता।
- पात्रता बनाम अनुभव:डॉ एम वी नायर केस के अनुसार, पात्रता चयन प्रक्रिया में प्रवेश की पहली शर्त है, जबकि अनुभव बाद में देखा जाता है।
- आरसीआई पंजीकरण की स्थिति:आरसीआई पंजीकरण आवश्यक है, लेकिन वर्तमान में कार्यरत होने की अनिवार्य शर्त का विकल्प नहीं है।
- तार्किक वर्गीकरण:कार्यरत संविदा शिक्षकों का विशिष्ट वर्ग बनाकर पहले उनकी स्क्रीनिंग करना दिव्यांग बच्चों को दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तार्किक माना गया है।
- अंतरिम राहत का प्रभाव:अंतरिम राहत के आधार पर परीक्षा देने से कोई कानूनी या स्थायी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
- उमा देवी केस का संदर्भ:न्यायालय ने उमा देवी केस का हवाला देते हुए कहा कि संविदा पर किया गया पिछला कार्य नियमित नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें और उनकी पृष्ठभूमि
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले पूर्व संविदा शिक्षकों ने अपनी दलीलों में अपनी लंबी सेवा अवधि और शैक्षणिक योग्यताओं का हवाला दिया था, यह तर्क देते हुए कि उन्हें केवल वर्तमान में बेरोजगार होने के आधार पर भर्ती प्रक्रिया से बाहर करना अनुचित और असंवैधानिक है। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे महाराजगंज जिले में समेकित शिक्षा योजना के तहत वर्ष 2005, 2006, 2010 और 2011 से इटिनरेंट/रिसोर्स टीचर (विशेष शिक्षक) के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने मई 2019 तक अपनी सेवाएं दीं, जिसके बाद जुलाई 2019 में विभाग ने जिले के 12 शिक्षकों का नवीनीकरण तो किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं सहित अन्य का नवीनीकरण नहीं किया गया।
नवीनीकरण न होने के विरुद्ध उन्होंने पहले भी उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसे पुष्पा श्रीवास्तव केस के आधार पर खारिज कर दिया गया था। इस मामले में एक विशेष अपील अभी भी विचाराधीन है। विशेष अपील बेंच के निर्देश पर, याचिकाकर्ताओं ने नियमित नियुक्ति के लिए एक प्रत्यावेदन दिया था, जिसे बेसिक शिक्षा अधिकारी महाराजगंज ने 15 जून को खारिज कर दिया था। इस अस्वीकृति को भी वर्तमान याचिका में चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी शैक्षणिक योग्यताओं पर जोर देते हुए कहा कि वे स्नातक हैं और उनके पास डीएड/बीएड (विशेष शिक्षा) की डिग्री है। इसके अतिरिक्त, उनका भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) का केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) वर्ष 2028/2033 तक वैध रूप से नवीनीकृत है। उनकी मुख्य दलील यह थी कि जब उनके पास सभी आवश्यक योग्यताएं और वैध पंजीकरण हैं, तो उन्हें केवल इस आधार पर बाहर करना कि वे वर्तमान में कार्यरत नहीं हैं, संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता) का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी पिछली सेवा और योग्यता को अनदेखा करना मनमाना है और उन्हें समान अवसर से वंचित करता है।
- सेवा अवधि:याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2005, 2006, 2010 और 2011 से महाराजगंज जिले में इटिनरेंट/रिसोर्स टीचर के रूप में कार्य किया था।
- सेवा समाप्ति:मई 2019 तक कार्य करने के बाद जुलाई 2019 में उनका नवीनीकरण नहीं किया गया।
- पिछली कानूनी कार्यवाही:नवीनीकरण न होने के विरुद्ध उनकी पिछली याचिका पुष्पा श्रीवास्तव केस के आधार पर खारिज हो चुकी थी।
- प्रत्यावेदन की अस्वीकृति:नियमित नियुक्ति के लिए दिए गए प्रत्यावेदन को बेसिक शिक्षा अधिकारी महाराजगंज ने 15 जून को खारिज कर दिया था।
- शैक्षणिक योग्यताएं:याचिकाकर्ता स्नातक हैं और उनके पास डीएड/बीएड (विशेष शिक्षा) की डिग्री है।
- आरसीआई पंजीकरण:उनका भारतीय पुनर्वास परिषद का केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर वर्ष 2028/2033 तक वैध रूप से नवीनीकृत है।
- संवैधानिक दलील:उनका तर्क था कि केवल वर्तमान में बेरोजगार होने के आधार पर उन्हें बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
भर्ती प्रक्रिया की पात्रता शर्तें और शासनादेश
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा 13 जून 2026 को जारी विज्ञापन और 6 सितंबर 2025 के शासनादेश ने विशेष शिक्षक भर्ती प्रक्रिया के लिए विस्तृत पात्रता मानदंड निर्धारित किए हैं। इन मानदंडों का पालन करना अभ्यर्थियों के लिए अनिवार्य है, और इन्हीं शर्तों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वैध ठहराया है।
विज्ञापन के सामान्य निर्देश संख्या 2 के तहत, अभ्यर्थियों के लिए यह अनिवार्य किया गया था कि वे संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से कार्यरत होने संबंधी सक्षम प्राधिकारी का अनुबंध पत्र/आदेश संलग्न करें। यह शर्त वर्तमान में कार्यरत होने की अनिवार्यता को रेखांकित करती है, जो इस पूरे मामले का केंद्रीय बिंदु रही है।
6 सितंबर 2025 के शासनादेश में शैक्षणिक और व्यावसायिक योग्यताओं को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है:
- प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए:स्नातक की डिग्री और भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) मान्यता प्राप्त डीएड (विशेष शिक्षा) की डिग्री अनिवार्य है। इसके साथ ही, अभ्यर्थी का केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) सक्रिय होना भी अनिवार्य है।
- उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6 से 8) के लिए:स्नातक की डिग्री और बीएड (विशेष शिक्षा) की डिग्री अनिवार्य है। इस स्तर के लिए भी अभ्यर्थी का केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) सक्रिय होना अनिवार्य है।
इसके अतिरिक्त, शासनादेश में कुछ अन्य महत्वपूर्ण शर्तें भी शामिल हैं:
- अधिकतम आयु सीमा:इन पदों के लिए अधिकतम आयु सीमा 60 वर्ष निर्धारित की गई है।
- शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी):सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, टीईटी को वांछनीय योग्यता माना गया है। इसका अर्थ है कि यह एक अतिरिक्त योग्यता है, लेकिन अनिवार्य नहीं।
- गैर-टीईटी पास संविदा शिक्षकों के लिए प्रावधान:ऐसे कार्यरत संविदा शिक्षक जो टीईटी उत्तीर्ण नहीं हैं, उनके लिए विभाग द्वारा विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने और उसमें उत्तीर्ण होने पर नियुक्ति का प्रावधान किया गया है।
- सामान्य सीधी भर्ती का क्रम:शासनादेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कार्यरत संविदा शिक्षकों की नियुक्ति के बाद ही अवशेष बचे पदों पर सामान्य सीधी भर्ती की जाएगी। यह दर्शाता है कि वर्तमान में कार्यरत संविदा शिक्षकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
- अनिवार्य अनुबंध पत्र:13 जून 2026 के विज्ञापन के अनुसार, संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से कार्यरत होने संबंधी सक्षम प्राधिकारी का अनुबंध पत्र/आदेश संलग्न करना अनिवार्य है।
- प्राथमिक स्तर की योग्यता (कक्षा 1-5):स्नातक, आरसीआई मान्यता प्राप्त डीएड (विशेष शिक्षा) और सक्रिय केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) अनिवार्य।
- उच्च प्राथमिक स्तर की योग्यता (कक्षा 6-8):स्नातक, बीएड (विशेष शिक्षा) और सक्रिय केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) अनिवार्य।
- अधिकतम आयु सीमा:60 वर्ष।
- टीईटी की स्थिति:सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार वांछनीय योग्यता, अनिवार्य नहीं।
- गैर-टीईटी संविदा शिक्षकों के लिए:विभाग द्वारा विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित कर उत्तीर्ण होने पर नियुक्ति का प्रावधान।
- भर्ती का क्रम:कार्यरत संविदा शिक्षकों की नियुक्ति के बाद ही शेष पदों पर सामान्य सीधी भर्ती।
न्यायिक दृष्टांत और कानूनी आधार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले को मजबूत कानूनी आधार प्रदान करने के लिए कई महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांतों और सिद्धांतों का सहारा लिया। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने विभिन्न सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख किया, जो पात्रता शर्तों, संविदा कर्मचारियों के अधिकारों और न्यायिक समीक्षा की सीमाओं को स्पष्ट करते हैं।
इस मामले का मूल आधार सर्वोच्च न्यायालय का रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ में दिया गया निर्देश है। इस निर्देश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि लगभग 4900 रिक्त पदों के लिए विज्ञापन निकालकर उन शिक्षकों के आवेदनों पर विचार किया जाए, जो संविदा या आउटसोर्सिंग पर काम कर रहे हैं। उच्च न्यायालय ने इसी निर्देश का पालन करते हुए वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त को वैध ठहराया, यह तर्क देते हुए कि वह सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों को शिथिल नहीं कर सकता।
न्यायालय ने डॉ एम वी नायर केस का हवाला देते हुए पात्रता और उपयुक्तता के बीच के अंतर को समझाया। इस केस के अनुसार, पात्रता चयन प्रक्रिया में प्रवेश की दहलीज है, जबकि पिछला अनुभव या उपयुक्तता केवल पात्रता पूरी होने के बाद देखी जाती है। इसका मतलब है कि भले ही याचिकाकर्ताओं के पास अनुभव था, लेकिन वे वर्तमान में कार्यरत होने की प्राथमिक पात्रता शर्त को पूरा नहीं कर पाए।
संविदा पर किए गए कार्य से नियमित नियुक्ति के कानूनी अधिकार के संबंध में, न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध उमा देवी केस का उल्लेख किया। उमा देवी केस ने यह स्थापित किया है कि संविदा पर किया गया पिछला कार्य नियमित नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता है। यह सिद्धांत याचिकाकर्ताओं की इस दलील को कमजोर करता है कि उनकी पिछली सेवा उन्हें नियमित नियुक्ति का अधिकार देती है।
न्यायालय ने अनवर अली सरकार और राम कृष्ण डालमिया केस का भी उल्लेख किया, जो वर्गीकरण की तार्किकता से संबंधित हैं। इन मामलों के आधार पर, न्यायालय ने कहा कि कार्यरत संविदा शिक्षकों का एक विशिष्ट वर्ग बनाकर पहले उनकी स्क्रीनिंग करना पूरी तरह तार्किक है। इस वर्गीकरण का सीधा संबंध दिव्यांग बच्चों को निरंतर दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से है, जो एक वैध और सार्वजनिक हित का लक्ष्य है।
इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने एस कृष्णा चैतन्य और अभिमन्यु राम केस का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत के आधार पर परीक्षा देने से अंतिम रूप से कोई कानूनी या स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता। याचिकाकर्ताओं को सशर्त स्क्रीनिंग में बैठने की अनुमति दी गई थी, लेकिन उनके परिणाम सीलबंद रखे गए थे। इस सिद्धांत ने यह सुनिश्चित किया कि अंतरिम आदेश अंतिम निर्णय को प्रभावित न करे। याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने प्रत्यावेदन को दया याचिका बताना भी इस बात का संकेत था कि वे कानूनी अधिकार के बजाय रियायत की मांग कर रहे थे। इन सभी न्यायिक दृष्टांतों ने उच्च न्यायालय के फैसले को एक मजबूत कानूनी नींव प्रदान की है।
- रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ:सर्वोच्च न्यायालय के इस मामले में दिए गए निर्देशों के तहत ही वर्तमान भर्ती प्रक्रिया संचालित हो रही है।
- डॉ एम वी नायर केस:इस केस ने पात्रता को चयन प्रक्रिया में प्रवेश की दहलीज बताया, जबकि अनुभव को पात्रता पूरी होने के बाद देखने योग्य माना।
- उमा देवी केस:इस ऐतिहासिक निर्णय ने स्थापित किया कि संविदा पर किया गया पिछला कार्य नियमित नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता।
- अनवर अली सरकार और राम कृष्ण डालमिया केस:इन मामलों ने तार्किक वर्गीकरण के सिद्धांत को मजबूत किया, जिसके आधार पर कार्यरत संविदा शिक्षकों का विशिष्ट वर्ग बनाना उचित ठहराया गया।
- एस कृष्णा चैतन्य और अभिमन्यु राम केस:इन निर्णयों ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत के आधार पर परीक्षा देने से कोई कानूनी या स्थायी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
- पुष्पा श्रीवास्तव केस:याचिकाकर्ताओं की नवीनीकरण न होने के विरुद्ध पिछली याचिका इसी केस के आधार पर खारिज की गई थी।
| तुलना का आधार | पूर्व संविदा शिक्षक (याचिकाकर्ता) | वर्तमान संविदा शिक्षक (पात्र अभ्यर्थी) |
|---|---|---|
| सेवा की स्थिति | मई 2019 से सेवा से बाहर | वर्तमान में संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग पर कार्यरत |
| भर्ती में पात्रता | उच्च न्यायालय द्वारा अपात्र घोषित | स्क्रीनिंग एवं चयन में पात्र |
| मुख्य दलील | अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन, पिछली सेवा और योग्यता के आधार पर पात्रता का दावा | विज्ञापन की शर्त के अनुसार वर्तमान में कार्यरत होने के कारण स्वतः पात्र |
| न्यायालय का दृष्टिकोण | पिछली सेवा नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं देती (उमा देवी केस), वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त अनिवार्य | सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप विशिष्ट वर्ग, दिव्यांग बच्चों को निरंतर दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तार्किक |
| आरसीआई पंजीकरण | वैध रूप से नवीनीकृत (2028/2033 तक) | सक्रिय सीआरआर अनिवार्य (प्राथमिक/उच्च प्राथमिक स्तर के अनुसार) |
| टीईटी की स्थिति | जानकारी उपलब्ध नहीं कि टीईटी पास थे या नहीं | वांछनीय योग्यता, गैरटीईटी पास के लिए विशेष टीईटी का प्रावधान |
| याचिका का परिणाम | याचिका खारिज, चयन प्रक्रिया से बाहर | चयन प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार बरकरार |
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का विशेष शिक्षक भर्ती पर मुख्य फैसला क्या है
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा लगभग 4900 विशेष शिक्षकों की भर्ती के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने विज्ञापन की उस शर्त को पूरी तरह से वैध, तर्कसंगत और संवैधानिक ठहराया है, जिसके तहत केवल वर्तमान में संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग के माध्यम से कार्यरत विशेष शिक्षकों को ही स्क्रीनिंग और चयन प्रक्रिया में शामिल होने की पात्रता दी गई है। इस फैसले के परिणामस्वरूप, वर्ष 2019 से सेवा से बाहर चल रहे पूर्व संविदा शिक्षकों की याचिका को खारिज कर दिया गया है, जिससे वे इस भर्ती प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाएंगे।
उच्च न्यायालय ने वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त को क्यों वैध ठहराया
उच्च न्यायालय ने वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त को वैध ठहराने के लिए कई तर्क दिए हैं। सबसे पहले, न्यायालय ने कहा कि यह शर्त सर्वोच्च न्यायालय के रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के तहत तय की गई है। दूसरा, न्यायालय ने डॉ एम वी नायर केस का हवाला देते हुए कहा कि पात्रता चयन प्रक्रिया में प्रवेश की दहलीज है, और वर्तमान में कार्यरत होना एक अनिवार्य पात्रता शर्त है जिसे उच्च न्यायालय शिथिल नहीं कर सकता। तीसरा, न्यायालय ने अनवर अली सरकार और राम कृष्ण डालमिया केस का उल्लेख करते हुए कहा कि कार्यरत संविदा शिक्षकों का एक विशिष्ट वर्ग बनाकर पहले उनकी स्क्रीनिंग करना पूरी तरह तार्किक है और इसका सीधा संबंध दिव्यांग बच्चों को निरंतर दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से है।
पूर्व संविदा शिक्षकों की मुख्य दलीलें क्या थीं
पूर्व संविदा शिक्षकों ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि वे महाराजगंज जिले में समेकित शिक्षा योजना के तहत वर्ष 2005, 2006, 2010 और 2011 से इटिनरेंट/रिसोर्स टीचर (विशेष शिक्षक) के रूप में कार्यरत थे और उन्होंने मई 2019 तक सेवाएं दी थीं। उनका नवीनीकरण जुलाई 2019 में नहीं किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि वे स्नातक हैं, उनके पास डीएड/बीएड (विशेष शिक्षा) की डिग्री है, और उनका भारतीय पुनर्वास परिषद का केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर वर्ष 2028/2033 तक वैध रूप से नवीनीकृत है। इसलिए, उन्हें केवल वर्तमान में बेरोजगार होने के आधार पर भर्ती से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
विशेष शिक्षक भर्ती के लिए निर्धारित विशिष्ट पात्रता मानदंड क्या हैं
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा 13 जून 2026 के विज्ञापन और 6 सितंबर 2025 के शासनादेश के अनुसार, विशेष शिक्षक भर्ती के लिए निम्नलिखित पात्रता मानदंड निर्धारित किए गए हैं: प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए स्नातक और भारतीय पुनर्वास परिषद मान्यता प्राप्त डीएड (विशेष शिक्षा) तथा सक्रिय केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) अनिवार्य है। उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6 से 8) के लिए स्नातक और बीएड (विशेष शिक्षा) तथा सक्रिय सीआरआर अनिवार्य है। अधिकतम आयु सीमा 60 वर्ष निर्धारित की गई है। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार वांछनीय योग्यता माना गया है। गैर-टीईटी पास कार्यरत संविदा शिक्षकों के लिए विभाग द्वारा विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित कर उत्तीर्ण होने पर नियुक्ति का प्रावधान भी है।
इस भर्ती प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का क्या महत्व है
इस विशेष शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का पूरा फैसला इन्हीं निर्देशों पर आधारित है। सर्वोच्च न्यायालय ने रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि लगभग 4900 रिक्त पदों के लिए विज्ञापन निकालकर उन शिक्षकों के आवेदनों पर विचार किया जाए, जो संविदा या आउटसोर्सिंग पर काम कर रहे हैं। उच्च न्यायालय ने इसी निर्देश को आधार बनाते हुए वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त को वैध ठहराया और कहा कि वह सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों को अपनी ओर से शिथिल नहीं कर सकता। यह दर्शाता है कि भर्ती प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण द्वारा निर्धारित सिद्धांतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य एक विशिष्ट वर्ग के अनुभवी शिक्षकों को प्राथमिकता देना है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का विशेष शिक्षक भर्ती पर आया यह फैसला उत्तर प्रदेश में संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति और पात्रता शर्तों के संबंध में एक महत्वपूर्ण न्यायिक स्थिति को स्पष्ट करता है। न्यायालय ने लगभग 4900 पदों पर होने वाली विशेष चयन प्रक्रिया में वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त को वैध ठहराकर, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और सार्वजनिक हित के उद्देश्यों को प्राथमिकता दी है। यह निर्णय उन पूर्व संविदा शिक्षकों के लिए निराशाजनक रहा है, जो वर्ष 2019 से सेवा से बाहर थे और अपनी पिछली सेवा तथा शैक्षणिक योग्यताओं के आधार पर नियमित नियुक्ति की उम्मीद कर रहे थे। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविदा पर किया गया पिछला कार्य नियमित नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता, और पात्रता चयन प्रक्रिया में प्रवेश की पहली दहलीज होती है।
इस फैसले से यह भी रेखांकित होता है कि न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं हैं और उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों को अपनी ओर से संशोधित नहीं कर सकता। कार्यरत संविदा शिक्षकों को प्राथमिकता देने का तर्क दिव्यांग बच्चों को निरंतर और दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जुड़ा है, जिसे न्यायालय ने तार्किक और संवैधानिक माना है। यह निर्णय भविष्य में उत्तर प्रदेश में होने वाली विभिन्न संविदा आधारित भर्तियों और उनके नियमितीकरण की मांगों पर भी प्रभाव डाल सकता है, जहां वर्तमान में कार्यरत होने की शर्त एक महत्वपूर्ण मानदंड बन सकती है। कुल मिलाकर, यह फैसला कानूनी सिद्धांतों, न्यायिक दृष्टांतों और सार्वजनिक नीति के उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का एक प्रयास है, जो भर्ती प्रक्रिया की अखंडता और पारदर्शिता को बनाए रखने पर केंद्रित है।
